
बाँके चमार
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1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास बहुतेरे नामों से समृद्ध है, परंतु कुछ ऐसे यशस्वी सेनानायक भी रहे, जो अपने अतुलनीय योगदान के बावजूद इतिहास की मुख्यधारा से बाहर कर दिए गए। बाँके चमार ऐसे ही एक विस्मृत किंतु गौरवशाली क्रांतिकारी थे, जिनका नाम भारत के स्वतंत्रता संघर्ष की जौनपुर क्रांति के साथ स्वर्णाक्षरों में अंकित किया जाना चाहिए।
बाँके चमार का जन्म उत्तर प्रदेश के जौनपुर जनपद की मछलीशहर तहसील स्थित कुंवरपुर ग्राम में हुआ था। 1857 की क्रांति जब उत्तर भारत के जनमानस को उद्वेलित कर रही थी, तब जौनपुर में हरपाल सिंह और बाँके चमार इसके प्रमुख नेतृत्वकर्ता बने। हरपाल सिंह न केवल बाँके चमार के युद्ध कौशल और रणनीतिक सूझबूझ से प्रभावित थे, बल्कि उन्हें अपने विश्वस्त सहयोगी के रूप में देखते थे। बाँके चमार ने अपने अद्भुत साहस, विवेक और युद्धनीति से कई बार ब्रिटिश सेना को छकाया तथा बारंबार उन्हें मुंहतोड़ उत्तर दिया।
अंग्रेजों की दृष्टि में बाँके चमार एक गंभीर संकट बनते जा रहे थे। उनकी बढ़ती ख्याति और जनता के बीच गहराता सम्मान औपनिवेशिक सत्ता के लिए असह्य होता जा रहा था। ब्रिटिश सरकार ने बाँके चमार तथा उनके 18 साथियों को ‘विद्रोही’ घोषित कर उनके सिर पर उस कालखंड की सबसे बड़ी इनामी राशि — ₹50,000 — घोषित की। यह उस युग की असाधारण धनराशि थी, जब दो गायें मात्र छह पैसे में खरीदी जा सकती थीं। यह तथ्य स्वयं उनकी वीरता और अंग्रेजी सत्ता के प्रति उनके प्रतिरोध की तीव्रता का प्रमाण है।
बाँके चमार ने अपने साथियों संग अनेक अवसरों पर ब्रिटिश सैनिकों का डटकर सामना किया, परंतु दुर्भाग्यवश, एक विश्वासघाती मुखबिर — सेवानिवृत्त ब्रिटिश सैनिक रमाशंकर तिवारी — ने उनकी गुप्त सूचना अंग्रेजों को दे दी। इसके उपरांत, एक भयंकर संघर्ष में कई अंग्रेज सैनिकों को मार गिराने के बाद अंततः बाँके चमार तथा उनके अठारह साथियों को बंदी बना लिया गया। इस अद्वितीय वीर को फांसी पर चढ़ा दिया गया — राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए सर्वोच्च बलिदान।
आज, बाँके चमार का नाम इतिहास के पन्नों में कहीं-कहीं मात्र एक इनामी विद्रोही के रूप में संक्षेप में दर्ज है। उन्हें वह सम्मान, वह ऐतिहासिक स्थान नहीं दिया गया, जिसके वे पूर्णतः अधिकारी थे। इतिहास लेखन की एकपक्षीय दृष्टि और वर्णगत पूर्वग्रहों ने इस महान दलित योद्धा को स्मृति के हाशिए पर धकेल दिया।
