अपराजिता की हिन्दी साहित्य यात्रा में आपका स्वागत है ।

यात्राएं अनेक है किन्तु गंतव्य एक है। जाने अंजाने उस अनेक से एक की यात्रा पर हम सभी जा रहे है। आशा है कि आप अपराजिता की साहित्य यात्रा का हिस्सा बन हमें अपने लक्ष्य तक पहुँचने मे सहयोग प्रदान करेंगे। काव्य अपराजिता, हिन्दी साहित्य  को समर्पित एक गैर व्यवसायिक वेबसाइट है । यह जीवन के अनुभव को हिन्दी साहित्य के रूप मे साझा करने का एक लघु प्रयास है । साहित्य मनुष्य की चेतना का प्रतिबिंब है । मनुष्य की चेतना जब शब्दों का रूप लेती है तो साहित्य की रचना होती है । साहित्य महज शब्दों की कारीगरी या कल्पना मात्र नहीं है, यह जीवन के विभिन्न अवसरों, परिस्थितियों में मनुष्य के संघर्ष, उल्लास, पीड़ा एवं प्रेम की अभिव्यक्ति है ।

घन-कुरंग

बाबा नागार्जुन नभ में चौकडियाँ भरें भलेशिशु घन-कुरंगखिलवाड़ देर तक करें भलेशिशु घन-कुरंगलो, आपस में गुथ गए खूबशिशु घन-कुरंगलो, घटा जल में गए डूबशिशु घन-कुरंगलो, बूंदें पडने लगीं, वाहशिशु घन-कुरंगलो,

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अन्न पचीसी के दोहे

बाबा नागार्जुन सीधे-सादे शब्द हैं, भाव बडे ही गूढ़अन्न-पचीसी घोख ले, अर्थ जान ले मूढ़। कबिरा खड़ा बाज़ार में, लिया लुकाठी हाथबन्दा क्या घबरायेगा, जनता देगी साथ। छीन सके तो

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हे कविकुलगुरु, हे संन्यासी

बाबा नागार्जुन हे दधीचि ! तुमसे घबराते हैं मांधाता,नहीं पूछते तुमको भारत भाग्य विधाता,मुदित देवगण, किन्तु तुम्हारा तप जारी है,जन-जीवन आलोड़ित, अद्भुत्त लाचारी है । वह चाटुकार-दल से घिरा इन्द्र

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अपने खेत में

बाबा नागार्जुन जनवरी का प्रथम सप्ताहखुशग़वार दुपहरी धूप में…इत्मीनान से बैठा हूँ….. अपने खेत में हल चला रहा हूँइन दिनों बुआई चल रही हैइर्द-गिर्द की घटनाएँ हीमेरे लिए बीज जुटाती

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कई दिनों तक चूल्हा रोया

बाबा नागार्जुन कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदासकई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्तकई दिनों तक चूहों की

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मैं स्वयं बन मेघ जाता

हरिवंश राय बच्चन “मेघ” जिस जिस काल पढ़ता,मैं स्वयं बन मेघ जाता! हो धरणि चाहे शरद कीचाँदनी में स्नान करती,वायु ऋतु हेमंत की चाहेगगन में हो विचरती, हो शिशिर चाहे

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