अपराजिता की हिन्दी साहित्य यात्रा में आपका स्वागत है ।

यात्राएं अनेक है किन्तु गंतव्य एक है। जाने अंजाने उस अनेक से एक की यात्रा पर हम सभी जा रहे है। आशा है कि आप अपराजिता की साहित्य यात्रा का हिस्सा बन हमें अपने लक्ष्य तक पहुँचने मे सहयोग प्रदान करेंगे। काव्य अपराजिता, हिन्दी साहित्य  को समर्पित एक गैर व्यवसायिक वेबसाइट है । यह जीवन के अनुभव को हिन्दी साहित्य के रूप मे साझा करने का एक लघु प्रयास है । साहित्य मनुष्य की चेतना का प्रतिबिंब है । मनुष्य की चेतना जब शब्दों का रूप लेती है तो साहित्य की रचना होती है । साहित्य महज शब्दों की कारीगरी या कल्पना मात्र नहीं है, यह जीवन के विभिन्न अवसरों, परिस्थितियों में मनुष्य के संघर्ष, उल्लास, पीड़ा एवं प्रेम की अभिव्यक्ति है ।

एक ही फ़िल्म

सीमा वर्मा ‘अपराजिता’ सिनेमा हॉल मेंएक साथ बैठे थे हम दोनों।एक ही पर्दे परएक ही फ़िल्म चल रही थी।तुमने देखा प्रेम,मैंने देखा समर्पण।तुमने देखा त्याग,मैंने देखा स्त्री से की गई

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प्रतीक्षा

सीमा वर्मा ‘अपराजिता’ तुम मुझेमेरे घर में खोज रहे थे,मेरे कपड़ों में,मेरे श्रृंगार में,मेरी मुस्कानोंऔर मेरी चुप्पियों के अर्थ में। तुम्हें लगता थामैं कहीं इन्हीं सबमें मिल जाऊँगी।पर मैं वहाँ

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हम

सीमा वर्मा ‘अपराजिता’ हम दोनों के हम होने की प्रक्रिया मेंमुझे तुम होना था, और तुम्हें मैं। मैं धीरे-धीरे तुम होती गई—अपनी इच्छाएँ, अपने शब्द, अपने रंग तुम्हारे नाम करती

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ओ लड़कियों लिखो

सीमा वर्मा ‘अपराजिता’ ओ लड़कियों,लिखो—अच्छा, बुरा, सही, गलत, टूटा-फूटा, जैसा भी लिख सको, लिखो।फिर उसे पढ़ो।पढ़कर लिखो, लिखकर फिर पढ़ो। इस लिखा-पढ़ी की यात्रा में धीरे-धीरे तुम्हारी अपनी आवाज़ तुम्हें

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आखिर मैने हंसना सीखा

सीमा वर्मा ‘अपराजिता’ आखिर मैंने हँसना सीखा।पर मैंने तो तुम्हें देखा पहले भीकई बार हँसते हुए,खिलखिलाते हुए,मुस्कुराते हुए।वो मेरा हँसना नहीं था,वो तो मेरी प्रकृति थी,मेरा स्वभाव था।आज अपनी प्रकृति

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तनाव

राजनंदिनी रावत जिसे मैं तनाव समझ रही थीवह सहजता का खो जाना थामैं घुटन महसूस कर रही थीऔर मैंने स्वयं को एक अंतहीन संघर्ष में फंसा हुआ पाया।“हेल्प मी”- भारी

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