आखिर मैंने हँसना सीखा।
पर मैंने तो तुम्हें देखा पहले भी
कई बार हँसते हुए,
खिलखिलाते हुए,
मुस्कुराते हुए।
वो मेरा हँसना नहीं था,
वो तो मेरी प्रकृति थी,
मेरा स्वभाव था।
आज अपनी प्रकृति से इतर
मैंने हँसना सीखा।
सीखा कि
हर मुस्कान प्रसन्नता नहीं होती,
कुछ मुस्कानें
टूटन को ढँकने का शिष्टाचार भी होती हैं।
पहले जो हँसी
अनायास होठों पर उतर आती थी,
अब उसे भीतर के अंधेरों से
खींचकर लाना पड़ता है।
पहले मैं हँसती थी
क्योंकि मन में उजाला था,
अब हँसती हूँ
ताकि भीतर पूरा अँधेरा न भर जाए।
पहले हँसी
जीवन का स्वाभाविक संगीत थी,
अब वह
एक कठिन साधना है—
अपने ही दुःख के विरुद्ध
धीरे-धीरे सीखी गई
एक विनम्र प्रतिरोध-कला।
