ओ लड़कियों लिखो

ओ लड़कियों,
लिखो—
अच्छा, बुरा,
सही, गलत, टूटा-फूटा,
जैसा भी लिख सको, लिखो।
फिर उसे पढ़ो।
पढ़कर लिखो,
लिखकर फिर पढ़ो।

इस लिखा-पढ़ी की यात्रा में
धीरे-धीरे तुम्हारी अपनी आवाज़
तुम्हें सुनाई देने लगेगी।
तुम देख पाओगी
वह चेहरा
जो दूसरों की अपेक्षाओं के पीछे
छिपा दिया गया था।
पहचान पाओगी झूठ को,
जान पाओगी सच को,
और समझ सकोगी
कि तुम्हारे भीतर भी एक संसार है,
जिसका निर्णय कोई और नहीं करेगा।
लिखते-लिखते तुम पा लोगी
अपने होने का अर्थ,
और जी सकोगी अपनी शर्तों पर,
अपनी मर्ज़ी से,
अपना जीवन।