प्रतीक्षा

तुम मुझे
मेरे घर में खोज रहे थे,
मेरे कपड़ों में,
मेरे श्रृंगार में,
मेरी मुस्कानों
और मेरी चुप्पियों के अर्थ में।

तुम्हें लगता था
मैं कहीं इन्हीं सबमें मिल जाऊँगी।
पर मैं वहाँ नहीं थी।
मैं तो
अपने हृदय की देहरी पर
साँझ का एक दीप जलाए
तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही थी।
प्रतीक्षा इस बात की
कि एक दिन
तुम मेरी सूरत से आगे,
मेरे जीवन से भीतर,
मेरे शब्दों से परे
उस स्त्री तक पहुँचोगे
जो घर नहीं है,
वस्त्र नहीं है,
श्रृंगार नहीं है—
जो बस
मैं हूँ।
और शायद तब
तुम मुझे नहीं,
मुझमें बसे उस प्रकाश को देख पाओगे
जिसकी लौ के पास
मैं इतने समय से
तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही हूँ।