सचाई थी कोई क़िस्सा नहीं था
वो मेरा था मगर मेरा नहीं था।
इसी से जीत के रास्ते खुले थे
वो हारा था मगर टूटा नहीं था।
मिली बस्ती तो कुछ-कुछ था डरा मैं
था जंगल में तो कुछ ख़तरा नहीं था।
वो कैसे जी रहा था राम जाने
जब उसके पास कुछ सपना नहीं था।
अजब बस्ती थी सब सोए हुए थे
वहां इक शख्स भी जागा नहीं था।
जो सपना था वो हो पाया न हासिल
जो हासिल है कभी सोचा नहीं था।
वो टिक पाता किसी दफ्तर में कैसे
किसी के सामने झुकता नहीं था।
बहुत चमका के रखता था वो चेहरा
मगर किरदार से उजला नहीं था।
-लक्ष्मी शंकर वाजपेयी
