न चुप रह के दे यूँ सज़ा ज़िन्दगी
सबब बेरुख़ी का बता ज़िन्दगी।
न कर रात-दिन यूँ दग़ा ज़िन्दगी
कभी तो किया कर वफ़ा ज़िन्दगी।
न ख़्वाबों में दिन यूँ बिता ज़िन्दगी
हक़ीक़त से नज़रें मिला ज़िन्दगी।
वही सिर्फ़ होगा हर इक हाल में
मुकद्दर में जो है लिखा ज़िन्दगी।
शराफ़त भुलाता बशर जा रहा
चली है ये कैसी हवा ज़िन्दगी।
कहीं टूट जाए न हिम्मत मेरी
न यूँ रात-दिन आज़मा ज़िन्दगी।
ये माने न माने ज़माना मगर
नहीं कुछ मुहब्बत बिना ज़िन्दगी।
उठाए न उँगली कोई जिस पे तू
ज़माने में ऐसी बना ज़िन्दगी।
सहर-शाम ‘हीरा’ दुखाती है दिल
ग़मों से बढ़ा राबता ज़िंदगी।
-हीरालाल यादव ‘हीरा’
