अपराजिता

अपराजिता
यह केवल अक्षरों का संयोजन नहीं,
यह उन रातों की राख से जन्मा नाम है
जहाँ मैं हर दिन
थोड़ा-थोड़ा जलती रही
और फिर भी
भोर की तरह लौटती रही।
यह नाम मैंने
किसी दर्प से नहीं चुना,
बल्कि इसलिए
कि मैंने अपने भीतर बैठे
उस अंधकार की आँखों में आँखें डाली हैं
जो मुझे हर रात
पराजय का अर्थ समझाता था।

मैंने उन जंजीरों की आहट सुनी है
जो धीरे-धीरे
मेरे पैरों की ओर बढ़ती थीं
समाज की,
भय की,
अपनों की चुप्पियों की,
और उन शब्दों की
जो स्त्री के पंखों को
मर्यादा कहकर काट देते हैं।
पर मैंने
अपने ही आँसुओं से
एक अग्नि रची,
और उसी अग्नि में
वे बंधन गलते गए।

हाँ,
पीड़ा मेरे हिस्से आई थी
जैसे किसी पुरानी ऋचा का श्राप।
वेदना ने
मेरे द्वार पर वर्षों तक दीप जलाए,
नियति ने
मेरे नाम के आगे
असंख्य विराम चिन्ह लगाए।
पर मैं टूटी नहीं।
मैंने अपने घावों को
कविता की तरह जिया है।
अब जब कोई मुझे
अपराजिता कहकर पुकारता है,
तो वह केवल मेरा नाम नहीं लेता
वह उन सभी स्त्रियों की कहानी पुकारता है
जो राख से उठी हैं,
जो रोईं अवश्य,
पर झुकी नहीं।

यह मेरा नाम नहीं
मेरे समूचे अस्तित्व का घोष है।
मेरी पराजयों के विरुद्ध
मेरा अंतिम और अमर प्रतिरोध।