कौन कहता है
मैं शिला थी?
मैं तो केवल
एक बहुत लम्बी पीड़ा थी
जिसे युगों ने
धरती पर रख छोड़ा था।
मेरे भीतर भी
एक नदी बहती थी
नीरव,
जैसे संध्या के आँचल में
दबा हुआ कोई विलाप।
पर आश्रमों के कठोर धर्म ने
उस जल को
पत्थर कह दिया।
उस दिन
जब छल ने
ऋषि का मुख पहन लिया था,
मैंने केवल इतना जाना
कि स्त्री की आँखों में
विश्वास सबसे पहले मरता है।
देवताओं के अपराध
आकाश पी जाता है,
पर स्त्री की देह पर लगा संशय
युगों तक धधकता रहता है।
इन्द्र लौट गए
अपने स्वर्ग की ओर,
गौतम लौट गए
अपने तप की ओर,
और मैं
मैं अपनी ही देह के अंधकार में
छोड़ दी गई।
जैसे किसी दीप से
उसकी लौ छीन ली जाए
और धुआँ
सदियों तक जीवित रहे।
मैंने बहुत पुकारा था
पर मेरी आवाज़
वन के सूखे पत्तों में
कहीं बिखर गई।
किसी ने नहीं सुना
कि शिला होने से पहले
मैं एक स्त्री थी
स्पर्श से नहीं,
अपमान से जड़ हुई स्त्री।
मेरी पलकों पर
जो ओस जमती थी
उसे सबने पत्थर का जल समझा,
किसी ने यह न जाना
कि वह मेरी आत्मा थी
जो धीरे-धीरे गल रही थी।
मैं आज भी देखती हूँ
कितनी अहिल्याएँ हैं।
वे घरों की चौखटों पर
मौन बैठी हैं,
उनके अधरों पर
करुणा की राख जमी है।
वे अपराधी नहीं,
फिर भी क्षमा माँगती हैं।
वे टूटी नहीं,
फिर भी स्वयं को दोष देती हैं।
उनकी आँखों में
एक पुराना वन रोता है।
और फिर
लोग कहते हैं
राम आए थे।
हाँ,
कदाचित आए होंगे,
पर मैं सोचती हूँ
क्यों हर बार
स्त्री की मुक्ति
किसी पुरुष के चरणों से लिखी जाए?
क्या उसके भीतर
कोई अग्नि नहीं जलती?
क्या उसकी आत्मा
स्वयं अपना स्पर्श नहीं बन सकती?
अब यदि कोई राम आएगा
तो मैं शिला बनकर नहीं रहूँगी।
मैं अपनी करुणा की राख से
एक नया जन्म चुनूँगी।
मैं कहूँगी
मुझे किसी उद्धार की आवश्यकता नहीं,
मैं केवल
अपने होने की स्वीकृति चाहती हूँ।
और तब
युगों से रोती हुई पृथ्वी पर
पहली बार
अहिल्या की आँखों में
करुणा नहीं
स्वतंत्रता का उजास होगा।
