कविताएँ ले लो कविताएँ सुनो सखी, क्या तुम सचमुच कविताएँ बेच रही हो? हाँ दो कविताएँ हैं मेरे पास। एक जीवन की, और एक मृत्यु की। बताओ, तुम्हें कौन-सी चाहिए?
मुझे जीवन की कविता दे दो। क्यों सखी, मृत्यु की क्यों नहीं ?
वह हँसी जैसे सूखे कुएँ में अचानक कोई पत्थर गिरा हो। फिर धीमे से बोली क्योंकि मृत्यु हर क्षण मुझमें घट रही है, और जीवन… जीवन तो मुझसे कोसों दूर खड़ा किसी अनजान पथिक-सा सिर्फ मुझे देखता रहता है।