सभा के मध्य
आज भी एक वस्त्र
अनंत होता जाता है,
और सभ्यता
अपने शास्त्रों की स्वर्ण-मुद्राएँ
आँखों पर रखकर
धर्म का जयघोष करती रहती है।
उधर
किसी एकांत अंतःपुर में
एक स्त्री
अपने ही प्रश्नों की राख पर
नंगे पाँव चलती हुई
धीरे-धीरे पत्थर हो रही है।
उसकी देह पर
समय ने जितने भी नाम लिखे,
वे सब संबंध थे
पर उसका अपना नाम
शायद किसी विस्मृत वेद-पृष्ठ पर
धूल की तरह सो गया।
वह कभी सीता की भाँति
अग्नि के आर-पार चलती रही,
कभी द्रौपदी-सी
राजसभाओं के अंधकार में
एक अकेली लौ बन काँपती रही,
कभी राधा होकर
विरह के यमुना-जल में
अपनी ही छाया डुबोती रही।
किन्तु किसी गीता ने
उसके संशयों का उत्तर नहीं दिया।
क्योंकि युद्धभूमियाँ
सदा पुरुषों के लिए रची गईं,
और स्त्रियों को
केवल प्रतीक्षा मिली
विजेताओं की,
पराजयों की,
या लौटकर कभी न आने वाले रथों की।
उसके भीतर भी
एक कुरुक्षेत्र था
जहाँ इच्छाएँ और मर्यादाएँ
प्रतिदिन आमने-सामने खड़ी रहीं;
जहाँ आत्मा
शंखनाद करना चाहती थी,
पर अधरों पर
मौन का शीतल राख-लेप रख दिया गया।
रात्रि के अंतिम प्रहर में
जब समस्त दिशाएँ
धुएँ की तरह थककर बैठ जाती हैं,
तब वही स्त्री
अपने भीतर के शून्य में
किसी अदृश्य बाँसुरी का स्वर सुनती है।
वह स्वर कहता है
धर्म वह नहीं
जो तुम्हें राख बना दे;
त्याग वह नहीं
जो तुम्हारे अस्तित्व को
दीप की अंतिम थरथराहट बना छोड़े।
तब वह देखती है
उसके भीतर
अब तक जो अश्रु था,
वही धीरे-धीरे
यमुना का विस्तार बन रहा है;
जो मौन था,
वही किसी अजन्मे श्लोक की तरह
धड़क रहा है।
और अचानक
सदियों से झुकी हुई वह देह
आकाश की ओर उठती है
जैसे किसी बंद मंदिर में
अचानक स्वयं दीपक बोल पड़े हों।
उस क्षण
न वह द्रौपदी रहती है,
न सीता,
न राधा
वह केवल चेतना होती है,
अग्नि और करुणा के मध्य
झूलती हुई
एक शाश्वत स्त्री-आत्मा,
जो पहली बार
अपने ही भीतर स्थित कृष्ण से कहती है
अब मैं प्रतीक्षा नहीं,
मैं स्वयं गीता हूँ।
