सांझ

आज
एक नदी को
अपने ही तट पर बैठकर रोते देखा है
उसकी आँखों में
काई नहीं,
सभ्यता का धुआँ तैर रहा था।
वनों की देह पर
लोहे के नाखूनों से लिखे गए
विकास के घोषणापत्र
अब रक्त रिसाते हैं।
पर्वतों की छाती में
बारूद के बीज बोकर
मनुष्य
अपने ही आकाश का अनाथ हो गया है।

मैंने हवा को
एक विधवा की तरह
सूने आँगन में भटकते देखा,
जिसके केशों में कभी
चम्पा की गंध बसती थी,
अब कारखानों की कालिख है।

ओ पृथ्वी!
तू कब से
अपने ही पुत्रों के हाथों
निर्वासित स्त्री बनी बैठी है?
तेरे आँचल की हरियाली
नीलाम हो चुकी,
तेरी नदियों के कंगन
पिघलाकर
बाज़ारों में बेच दिए गए।
और इस सबके बीच
मनुष्य
अपने ही बनाए शीशमहलों में
इतना अकेला है
कि उसकी हँसी भी
काँच की किरचों-सी चुभती है।

कितनी विचित्र बात है
जिसने चिड़ियों से उड़ना सीखा,
उसी ने आकाश को धुएँ से भर दिया।
जिसने वृक्षों की छाँव में
प्रेम के प्रथम अक्षर लिखे,
उसी ने कुल्हाड़ी को
अपना धर्म बना लिया।

मैं सोचती हूँ
क्या किसी दिन
सूरज भी थककर
समुद्र में डूबते समय
मनुष्य से पूछेगा
तुमने मेरे उजाले का
क्या किया ?
और तब
शायद कोई बच्चा
किसी सूखी नदी के किनारे
मिट्टी में उँगली से
एक वृक्ष बनाएगा
जैसे अंधकार में
अब भी बची हो
प्रार्थना की अंतिम लौ।
तब पृथ्वी
अपनी टूटी हुई साँसों के बीच
धीरे से मुस्कराएगी
जैसे महाप्रलय के बाद भी
किसी स्त्री के भीतर
प्रेम जीवित रह जाता है।