साथी, सांझ लगी अब होने हरिवंश राय बच्चन फैलाया था जिन्हें गगन में,विस्तृत वसुधा के कण-कण में,उन किरणों के अस्ताचल पर पहुँच लगा है सूर्य सँजोने!साथी, साँझ लगी अब होने!खेल रही थी धूलि कणों में,लोट-लिपट गृह-तरु-चरणों में,वह छाया, देखो जाती है प्राची में अपने को खोने!साथी, साँझ लगी अब होने!मिट्टी से था जिन्हें बनाया,फूलों से था जिन्हें सजाया,खेल-घरौंदे छोड़ पथों पर चले गए हैं बच्चे सोने!साथी, साँझ लगी अब होने!