Ashok Chakradhar

डॉ अशोक चक्रधर

जीवन परिचय

डॉ. अशोक चक्रधर हिंदी साहित्य और मंच के ऐसे हस्ताक्षर हैं, जिन्होंने हास्य को फूहड़पन से निकालकर उसे गहरी सामाजिक चेतना और बौद्धिक व्यंग्य का माध्यम बनाया। 8 फरवरी 1951 को उत्तर प्रदेश के खुर्जा (बुलंदशहर) में जन्मे अशोक चक्रधर को शब्दों की समझ और कलात्मक माहौल विरासत में मिला। उनके पिता डॉ. राधेश्याम ‘प्रगल्भ’ स्वयं प्रतिष्ठित कवि और बाल साहित्यकार थे। बचपन से ही घर में छनती किताबों की महक और साहित्यिक चर्चाओं ने बालक अशोक के भीतर संवेदना के बीज बो दिए थे।

बचपन पार कर जब वे शिक्षा की ओर बढ़े, तो भाषा पर उनकी पकड़ और मजबूत होती गई। उन्होंने हिंदी में एम.ए. और पीएच.डी. की उपाधि हासिल की। इसके बाद उन्होंने जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली में अध्यापन शुरू किया और लंबे समय तक हिंदी विभागाध्यक्ष के पद पर रहकर छात्रों में भाषा और कविता की लौ जलाई। 1970 के दशक में जब कवि सम्मेलनों का दौर एक तय ढर्रे पर चल रहा था, तब चक्रधर एक अनोखी शैली लेकर मंच पर आए—चेहरे पर सहज मुस्कान, संवाद की बोलचाल वाली सहजता और पंक्तियों के भीतर तीखा सामाजिक सरोकार। उन्होंने आम आदमी की रोजमर्रा की विसंगतियों, राजनीति के दोहरेपन और मानवीय कमजोरियों पर चुटीले प्रहार किए। उनकी शैली ऐसी थी कि श्रोता पहले ठहाका लगाता और फिर उस पंक्ति के पीछे छिपे दर्द पर सोचने को विवश हो जाता। भारत सरकार ने साहित्य और शिक्षा में उनके योगदान को रेखांकित करते हुए 2014 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया।

काव्य संग्रह-
बूढ़े बच्चे, तमाशा, खिड़कियाँ, बोल-गप्पे, छुट्टी हो गई, सोची-समझी, रंग जमा लो, हंसों और मर जाओ, जो करे जो जोकर, चुनी-चुनाई, चुटपुटकुले, सो तो है, ए जी सुनिए      

नाटक/एकांकी 
रंग-तरंग, बिटिया की सगाई, बंदरिया चली ससुराल

बाल साहित्य   
एक बगिया में, नाच नचाया, भालू का भ्राता, मोटू की मूंछ

समीक्षा एवं अनुवाद  
मुक्तिबोध की काव्य प्रक्रिया, ग़ालिब की शायरी (लिप्यंतरण/संपादन)

प्रतिनिधि रचनाएं