मेरे जज़्बात-काव्य संग्रह
- रचनाकार- देवेंद्र प्रताप वर्मा ‘विनीत’
- श्रेणी-एकल काव्य संग्रह
- सम्पादन-काव्य अपराजिता
- प्रकाशक- Notion Press
- ISBN- 979-8900235356
- Website-https://notionpress.com/
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परिचर्चा/समीक्षा- काव्य अपराजिता
कविता केवल अक्षरों का संयोजन या तुकबंदी नहीं है, बल्कि अंतर्मन में सुलगती भावनाओं की सहज और पावन अभिव्यक्ति है। कवि जब अपनी व्यक्तिगत टीस, उल्लास, विरह और सामाजिक चिंताओं को कागज़ पर उकेरता है, तो वह समष्टि का स्वर बन जाती है। देवेंद्र प्रताप वर्मा ‘विनीत’ का काव्य-संग्रह ‘मेरे जज़्बात’ इसी आत्मानुभूति और जीवन-दर्शन का सजीव दस्तावेज़ है। स्व० सीमा वर्मा ‘अपराजिता’ की स्मृति को समर्पित साहित्यिक पटल ‘काव्य अपराजिता’ से प्रकाशित यह कृति अपनी सहजता, संवेदनशीलता और कथ्य के विस्तार से पाठक को पहले ही पृष्ठ से बाँध लेती है। कवि ने अपनी जीवन-संगिनी विनीता वर्मा को यह संग्रह समर्पित कर इसके आत्मीय पक्ष को और भी प्रगाढ़ बना दिया है।
‘मेरे जज़्बात’ किसी एक दायरे में बँधी रचनाओं का संकलन नहीं है; इसमें जीवन के लगभग सभी रंगों और भाव-भंगिमाओं का सुंदर समन्वय है। प्रेम, विरह और तन्हाई की गूँजसंग्रह का एक बड़ा हिस्सा प्रेम के विभिन्न आयामों को रेखांकित करता है। यहाँ प्रेम में केवल मिलन की चंचलता नहीं, बल्कि विरह की गंभीरता और गरिमा है। ‘तेरी बातें’, ‘दौर-ए-मोहब्बत’, ‘इंतज़ार’ और ‘किसे अपना कहें’ जैसी रचनाओं में कवि की संवेदनशीलता चरम पर दिखती है।
“जीवन के इस मोड़ पे ख़ुद हम, आए नही हैं लाये गए हैं।
तेरी कसम सच रोये नही हैं, वक़्त के मारे रुलाये गए हैं॥”
‘तन्हाइयाँ’ कविता में अकेलापन नकारात्मक न होकर आत्म-साक्षात्कार का साधन बन जाता है:
“खुद के होने का एहसास दिलाती हैं तन्हाइयाँ,
यूँ ही नही किसी को मिल जाती है तन्हाइयाँ॥”
प्रखर नारी-चेतना और मानवीय गरिमाकवि की दृष्टि में नारी केवल शृंगार या ममता की मूरत नहीं, बल्कि संघर्ष और अस्मिता की प्रतीक है। ‘मैं नारी हूँ’ कविता पुरुष-प्रधान समाज के दोहरे चरित्र और विडंबना पर सीधा प्रहार करती है:
“शक्ति हूँ, प्रेम हूँ, भक्ति हूँ,
युगों से पूजा है,
श्रद्धा कहा है…
फिर भी नर, तेरे झूठ, फरेब
और अहम से हारी हूँ,
मैं नारी हूँ।”
यही स्वर ‘माँ जगदम्बे’ जैसी स्तुति में भी परिलक्षित होता है, जहाँ कवि शक्ति की वास्तविक पूजा नारी के सम्मान में देखता है। व्यक्तिगत राग-विराग से ऊपर उठकर कवि देश और समाज की विसंगतियों पर भी बेबाक लिखते हैं। ‘वतन के वास्ते जीना चाहता क्यों नही कोई’ में केवल शहादत के नारों के बजाय देश के लिए रचनात्मक जीवन जीने का आह्वान किया गया है:
“वतन के वास्ते मरने की हसरत सबके दिल में है,
वतन के वास्ते जीना चाहता क्यों नही कोई॥”
वहीं ‘सूखे की आहट’ में कृषक जीवन की बेबसी और पर्यावरण संकट की मार्मिक पुकार सुनाई देती है। ‘मैं वही हूँ’ और ‘सत्य का आलोक’ जैसी रचनाएँ पाठक को अस्तित्ववादी प्रश्नों और आत्म-चिंतन की ओर ले जाती हैं। ‘अंधेरे को चल हम उजालों में लाएं’ में अंधकार को मात्र निराशा नहीं, बल्कि सृजन का बीज-गर्भ मानकर एक सकारात्मक जीवन-दृष्टि दी गई है। गंभीर और भावुक रचनाओं के बीच ‘सीख-हास्य कविता’ युवावस्था की नादानियों, दिवास्वप्नों और यथार्थ की ठोकर को बड़े ही चुटीले और हास्यप्रद अंदाज़ में प्रस्तुत कर पाठकों के चेहरे पर सहज मुस्कान बिखेर देती है। शिल्प, भाषा और शैलीसहज संप्रेषणीयता: कवि ने भाषा को क्लिष्टता से दूर रखा है। बोलचाल की सहज हिंदी और उर्दू के नफ़ीस शब्दों (अल्फ़ाज़, तिस्नगी, परवाज़, रहनुमा) का ऐसा प्रयोग किया गया है जो सीधे पाठक के दिल में उतर जाता है। गीतों और ग़ज़लों में बहर और लय का सुंदर निर्वाह हुआ है। ‘शिक्षक’, ‘रथ चला वृन्दावन पथ पर’ और ‘जीवन’ जैसी कविताएँ प्रवाहपूर्ण और गुनगुनाने योग्य हैं।
प्रकृति, दिए, बाती, समंदर, टूटी नाव और रेगिस्तान जैसे लोक-प्रचलित प्रतीकों के ज़रिए गहरी दार्शनिक बातें सरलता से कह दी गई हैं। निष्कर्ष‘मेरे जज़्बात’ केवल एक कवि का एकालाप नहीं है, बल्कि यह हर उस संवेदनशील हृदय की आवाज़ है जिसने कभी प्रेम किया है, विरह सहा है, समाज को करीब से देखा है और अपने भीतर के शून्य से संवाद किया है। देवेंद्र प्रताप वर्मा ‘विनीत’ की यह कृति समकालीन हिंदी साहित्य में एक सार्थक और विचारोत्तेजक हस्तक्षेप है। यह संग्रह उन सभी सुधी पाठकों के लिए एक ज़रूरी दस्तावेज़ है जो कविता में कोरी कल्पना के बजाय जीवन का धड़कता हुआ यथार्थ और सच्ची भावनाएँ तलाशते हैं।
