Pratiksha

प्रतीक्षा-काव्य अपराजिता

परिचर्चा/समीक्षा- संदीप कुमार

देवेंद्र प्रताप वर्मा ‘विनीत’ का काव्य-संग्रह ‘प्रतीक्षा’ पहली दृष्टि में जीवन के विविध अनुभवों से उपजी कविताओं का संग्रह दिखाई देता है, किंतु उसके भीतर उतरने पर यह केवल कविताओं का संकलन नहीं रह जाता। यह एक ऐसे मन की यात्रा बन जाता है जो प्रेम से शुरू होकर विरह, स्मृति, संघर्ष, कर्तव्य, सामाजिक विडंबना, राष्ट्र, श्रम, आध्यात्मिकता और अंततः स्वयं की खोज तक पहुँचता है। इसीलिए ‘प्रतीक्षा’ को किसी एक काव्य-विधा, भावभूमि या विषय की सीमा में बाँधना कठिन है।

संग्रह की प्रस्तावना में कवि लिखता है—“जीवन का अनुभव, सत्य का अनुभव है / स्वयं का अनुभव है।” यही कथन इस पूरे संग्रह की केंद्रीय कुंजी है। कवि बाहरी संसार को जितना देखता है, उतना ही अपने भीतर भी देखता है। उसके लिए प्रेम केवल किसी प्रिय व्यक्ति को पाने की आकांक्षा नहीं, बल्कि आत्मा के किसी खोए हुए हिस्से को पहचानने की प्रक्रिया है। दुख केवल व्यक्तिगत पीड़ा नहीं, बल्कि मनुष्य होने की नियति का अनुभव है। और प्रतीक्षा केवल किसी के आने की प्रतीक्षा नहीं, बल्कि उस अर्थ की प्रतीक्षा है जो जीवन को पूर्णता प्रदान कर सके।

‘प्रतीक्षा’ का सबसे व्यापक भाव प्रेम है। किंतु यह प्रेम एकरेखीय नहीं है। कहीं वह किशोर मन की निष्कलुष आकांक्षा है, कहीं दाम्पत्य की प्रतीक्षा, कहीं विरह की तपस्या, कहीं स्मृति का आलोक और कहीं ऐसा आध्यात्मिक भाव जिसमें ‘मैं’ और ‘तुम’ का भेद धीरे-धीरे मिटने लगता है। ‘मैंने भी मोहब्बत की थी कभी’ इस दृष्टि से संग्रह की अत्यंत स्मरणीय रचनाओं में है। इसमें प्रेम का कोई नाटकीय उत्कर्ष नहीं, बल्कि उसकी मासूम स्मृति है। प्रेम यहाँ कहा कम गया है, जिया अधिक गया है। “न उसने कभी कहा कुछ, / न मैं उससे कुछ कह पाया”—इन पंक्तियों में उस प्रेम की पूरी विडंबना समाहित है जो अभिव्यक्ति से पहले ही स्मृति बन जाता है।

इसी क्रम में ‘जीवन साथी’, ‘मधुमास’, ‘जाओ प्रियतम अपने पथ पर’, ‘मन क्यों तेरे पीछे भागे’, ‘फिर आऊंगा गीत लिए’ और ‘प्रतीक्षा-2’ जैसी कविताएँ प्रेम के अलग-अलग मनोवैज्ञानिक स्तरों को सामने लाती हैं। इनमें मिलन की आकांक्षा है तो वियोग का आत्मसंयम भी; अधिकार की इच्छा है तो त्याग की गरिमा भी। लेकिन संग्रह की सबसे महत्वपूर्ण प्रेम-कविता निस्संदेह ‘प्रतीक्षा’ है। यह रचना पारंपरिक प्रेम-कविता की सीमाओं को तोड़ती है। यहाँ ‘तुम’ धीरे-धीरे एक व्यक्ति से अधिक एक अनुपस्थित उपस्थिति बन जाता है। कविता का सबसे मार्मिक पक्ष यह है कि वर्तमान संबंध के भीतर भी एक अदृश्य अनुपस्थिति जीवित रहती है। “अब मैं हूँ / जिसे वह / अपना कहती है / तुम जानते हो”—यह कथन प्रेम, विवाह, स्मृति और अस्तित्व के बीच पैदा होने वाले उस जटिल अंतर्द्वंद्व को व्यक्त करता है जिसे सामान्य प्रेम-कविता प्रायः छू नहीं पाती।

अंततः कवि कहता है कि उसकी प्रतीक्षा उस असीम आकाश में फिर ‘तुम’ होने की है। यही वह क्षण है जहाँ व्यक्तिगत प्रेम आध्यात्मिक संकेत में बदल जाता है। विरह यहाँ केवल दुःख नहीं, सृजन की भूमि है। इस संग्रह का एक उल्लेखनीय गुण यह है कि कवि पीड़ा से भागता नहीं। वह पीड़ा को देखता है, उसे जीता है और फिर उसे कविता में बदल देता है। ‘ग़म के फूल’ इस प्रक्रिया का सुंदर प्रतीक है। कवि दुख के बीज को उपवन में बोता है और आँसुओं से उसे सींचता है। परिणामस्वरूप वही पीड़ा पुष्प बन जाती है। यह बिंब कवि की काव्य-दृष्टि का सार है—दुःख समाप्त नहीं होता, उसका रूपांतरण होता है। इसीलिए ‘तन्हाई’, ‘प्रतीक्षा-2’, ‘ख़त्म मेरा किरदार करो’, ‘जीवन मे कब आओगे’ और ‘प्रतिबंध’ जैसी रचनाओं में दुख केवल शिकायत नहीं है। वह आत्मसंवाद का माध्यम बन जाता है। विशेष रूप से ‘तन्हाई’ में अकेलापन लगभग एक जीवित पात्र की तरह उपस्थित है। कवि उससे रिश्ता झूठा नहीं कह सकता। यहाँ तन्हाई शत्रु नहीं, बल्कि वह साथी है जिसके सामने मनुष्य अपने भीतर का वास्तविक चेहरा रख सकता है।

संग्रह का दूसरा महत्वपूर्ण आयाम आध्यात्मिक है। ‘आत्मा’, ‘कौन है जो मेरे भीतर है’, ‘संतोष’, ‘जीवन सहज सरल है साथी’ जैसी रचनाओं में कवि बाहरी संसार से भीतर की ओर लौटता है। ‘कौन है जो मेरे भीतर है’ संग्रह के दार्शनिक केंद्र के निकट पहुँचती कविता है। कवि देखता है कि उसकी आँखों से कोई संसार को देख रहा है, कानों से कोई सुन रहा है, श्वासों में कोई आता-जाता है—लेकिन वह स्वयं उस ‘किसी’ को देख नहीं पाता। यह प्रश्न भारतीय आध्यात्मिक परंपरा के उस शाश्वत प्रश्न से जुड़ जाता है—द्रष्टा कौन है? ‘आत्मा’ में घटाकाश और महाकाश का बिंब इसी खोज को सरल दार्शनिक भाषा देता है। आत्मा और परमात्मा के संबंध को कवि बूंद और सागर तथा घटाकाश और आकाश के माध्यम से समझने का प्रयास करता है।यहाँ कवि किसी जटिल दार्शनिक तंत्र का निर्माण नहीं करता; वह अनुभूति की भाषा में दर्शन को पकड़ने की कोशिश करता है। उसकी दार्शनिकता पुस्तकालय से नहीं, अनुभव से आती प्रतीत होती है। ‘संतोष’ विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यहाँ कवि सफलता और असफलता के संबंध पर प्रश्न उठाता है। वह देखता है कि सफलता की तीव्र आकांक्षा ही असफलता के भय को जन्म देती है और वही भय आत्मविश्वास को नष्ट करता है।

कविता धीरे-धीरे बाहरी उपलब्धि से आंतरिक आनंद की ओर मुड़ती है। अंतिम बिंब—“स्वयं में निहित आनंद की बाँसुरी”—कविता की पूरी यात्रा को समेट लेता है। यह विचार संग्रह की प्रस्तावना में व्यक्त आत्म-अन्वेषण से भी जुड़ता है। अर्थात् कवि बाहर उस वस्तु की खोज करता है जिसकी अनुपस्थिति उसे बेचैन करती है, लेकिन धीरे-धीरे उसे संकेत मिलता है कि खोज का अंतिम पड़ाव स्वयं के भीतर है। ‘प्रतीक्षा’ की एक बड़ी विशेषता यह है कि कवि केवल अपने प्रेम और अपने दुख में बंद नहीं रहता। उसका संवेदनशील मन सामाजिक पीड़ा की ओर भी जाता है। ‘मजदूर’ इसका प्रभावशाली उदाहरण है। कविता में पसीने की बूंद धरा पर गिरती है और श्रम की सूक्ष्म उपज बन जाती है। फिर वही श्रमिक पूछता है—क्या मेरी तृष्णा का भी कोई स्वाभाविक उपचार है? क्या श्रम का भी कुछ अधिकार है? यह प्रश्न कविता को केवल मजदूर की करुण कथा बनने से बचाता है और उसे श्रम, मूल्य तथा अधिकार के व्यापक विमर्श से जोड़ देता है।

‘कवितायें भी रोती हैं’ में भी कवि कविता को केवल सौंदर्य का माध्यम नहीं मानता। भूखा बच्चा, श्रम करते नन्हे कंधे और वंचित जीवन जब सामने आते हैं, तो कविता स्वयं रोने लगती है। यहाँ कवि की सौंदर्य-दृष्टि सामाजिक संवेदना से जुड़ जाती है। ‘राष्ट्र-भक्त’, ‘स्वतंत्रता’ और ‘हिन्दोस्तां को अंगारों पर मैंने रोज सुलगते देखा’ जैसी कविताएँ कवि की राष्ट्र-दृष्टि को सामने लाती हैं। इन रचनाओं में राष्ट्र केवल सीमा, झंडे या युद्ध का प्रतीक नहीं है। कवि के लिए राष्ट्र घर है—और उस घर में परिवार, मानवता, नैतिकता, स्त्री की गरिमा, न्याय और सामाजिक सम्मान सब शामिल हैं।

‘स्वतंत्रता’ में कवि एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न पूछता है—यदि देश स्वतंत्र है तो माँ भारती की आँखों में नमी क्यों है? इसके बाद कविता स्वतंत्रता के सामाजिक अर्थ को तलाशती है। स्त्री की असुरक्षा, पारिवारिक विघटन, झूठ का विस्तार, अन्याय, आर्थिक विषमता और मानवता के क्षरण को कवि स्वतंत्रता की अधूरी उपलब्धि के रूप में देखता है। यहाँ स्वतंत्रता केवल विदेशी सत्ता से मुक्ति नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर और समाज के भीतर मौजूद हिंसा, अन्याय और असमानता से मुक्ति भी है।

‘प्रतीक्षा’ का एक अलग रंग ‘बचपन के दिन’, ‘बी०टेक० के चार वर्ष’ और ‘अंध-विश्वास’ जैसी कविताओं में दिखाई देता है। ‘बचपन के दिन’  में गाँव, पगडंडी, गौशाला, तालाब, आम का पेड़, बूढ़ी काकी और बच्चों की टोली मिलकर स्मृति का ऐसा संसार रचते हैं जिसमें जीवन अधिक सहज और मनुष्य अधिक निकट दिखाई देता है। ‘बी०टेक० के चार वर्ष’ संग्रह की दूसरी रचनाओं से बिल्कुल अलग है। इसमें व्यक्तिगत स्मृतियों, मित्रों, कॉलेज, रैगिंग, बस, परीक्षा, कैंटीन और दोस्ती की घटनाओं को कविता का रूप दिया गया है। इसमें साहित्यिक गंभीरता के बजाय जीवन की चंचलता और युवा ऊर्जा है। यही विविधता संग्रह को जीवंत बनाती है। ‘अंध-विश्वास’ में हास्य, आत्मव्यंग्य और सामाजिक आलोचना का सुंदर मेल है। बालसुलभ बहाने से शुरू हुई घटना अंततः पूरे गाँव में अंधविश्वास के निर्माण की प्रक्रिया को उजागर करती है। कविता का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि कवि स्वयं को भी आलोचना के केंद्र में रखता है। वह केवल दूसरों को अंधविश्वासी नहीं कहता, बल्कि स्वीकार करता है कि उसका अपना नाटक भी अंधविश्वास के विस्तार का कारण बना।

‘प्रतीक्षा’ की भाषा मूलतः सहज, भावप्रधान और संप्रेषणीय है। कवि संस्कृतनिष्ठ शब्दावली—जैसे “चेतना”, “प्रभा”, “अंतर्मन”, “सत्पथ”, “परमार्थ”, “किरणपुंज”—के साथ उर्दू-फ़ारसी शब्दों—“ग़म”, “फ़साना”, “मोहब्बत”, “तन्हाई”, “अफ़साना”, “वक़्त”—का भी स्वाभाविक उपयोग करता है। यह भाषिक मिश्रण संग्रह के प्रेम और जीवन संबंधी हिस्सों को विशेष आत्मीयता देता है। कवि की एक विशिष्ट प्रवृत्ति बिंबों की पुनरावृत्ति भी है। फूल, दीपक, धूप, चाँद, आँसू, नदी, पगडंडी, आकाश और जुगनू जैसे प्रतीक अनेक कविताओं में दिखाई देते हैं। कहीं-कहीं इन प्रतीकों का अत्यधिक दोहराव कविता को परिचित या अपेक्षित बना देता है, किंतु दूसरी ओर यही प्रतीक पूरे संग्रह को एक साझा भाव-संसार भी प्रदान करते हैं। कई कविताएँ गीतात्मक हैं और उनमें मुखड़े तथा पुनरावृत्ति का प्रभाव स्पष्ट है। इससे उनकी गेयता बढ़ती है। दूसरी ओर ‘साक्षात्कार’, ‘एकाकीपन’, ‘संतोष’, ‘मजदूर’ और ‘प्रतीक्षा’ जैसी लंबी रचनाएँ मुक्त कथात्मक प्रवाह के करीब जाती हैं।

इस पुस्तक की सबसे बड़ी शक्ति उसका भावों के प्रति ईमानदार होना है। कवि अपने अनुभवों को किसी कृत्रिम बौद्धिकता के आवरण में नहीं छिपाता। प्रेम है तो प्रेम की तरह बोलता है, पीड़ा है तो पीड़ा की तरह, राष्ट्र का प्रश्न है तो प्रश्न करता है और आत्मा का प्रश्न है तो स्वीकार करता है कि वह स्वयं भी उस रहस्य को पूरी तरह नहीं समझ पाया। यही कारण है कि कई जगह भाषा पारंपरिक या सरल होते हुए भी भाव आधुनिक और जटिल हो जाते हैं। कवि की दृष्टि में मनुष्य एक ही समय में प्रेमी भी है, कर्मशील भी, परिवार का सदस्य भी, नागरिक भी, राष्ट्रभक्त भी और अपने भीतर किसी अनाम सत्ता का खोजी भी। ‘प्रतीक्षा’ इसी बहुस्तरीय मनुष्य का काव्यात्मक दस्तावेज है।

संग्रह की आलोचनात्मक समीक्षा करते हुए उसकी कुछ सीमाओं का उल्लेख आवश्यक है। कई कविताओं में भाव की पुनरावृत्ति दिखाई देती है। विशेषकर प्रेम, विरह, प्रतीक्षा, आँसू, चाँद, फूल और मिलन से जुड़े बिंब अनेक रचनाओं में बार-बार आते हैं। इससे कुछ स्थानों पर कविताओं के बीच भावात्मक दूरी कम हो जाती है। कुछ रचनाओं में विचार कविता पर अधिक हावी हो जाता है। वहाँ कविता का बिंबात्मक तनाव कम होकर कथन या संदेश प्रमुख हो जाता है। इसी प्रकार कहीं-कहीं तुक और छंद को बनाए रखने की कोशिश में भाषा स्वाभाविक प्रवाह से थोड़ी दूर जाती है।

पूरे संग्रह को एक सूत्र में बाँधने की कोशिश करें तो वह सूत्र है—मनुष्य की किसी पूर्णता की प्रतीक्षा। ‘प्रतीक्षा’ देवेंद्र प्रताप वर्मा ‘विनीत’ के भीतर घटित जीवन-संवाद का काव्यात्मक दस्तावेज है। इसमें किशोर प्रेम की निष्कलुषता है, विरह की तपन है, स्मृतियों की नमी है, संघर्ष की आग है, सामाजिक विषमता की बेचैनी है, राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व है और अंततः आत्मा के रहस्य को जानने की दार्शनिक जिज्ञासा है। इस संग्रह की साहित्यिक यात्रा बाहर से भीतर की ओर जाती है। आरंभ में कवि संसार से संवाद करता है, फिर प्रिय से, फिर समाज से, फिर राष्ट्र से और अंततः स्वयं से। और शायद यही इस पुस्तक का सबसे सुंदर विरोधाभास है—कवि जिस ‘तुम’ की प्रतीक्षा करता हुआ दिखाई देता है, उसकी खोज करते-करते वह धीरे-धीरे अपने ही भीतर पहुँचने लगता है। ‘प्रतीक्षा’ इसलिए केवल किसी के आने की कविता नहीं है; यह उस क्षण की प्रतीक्षा है जब मनुष्य अपने भीतर छिपे हुए मनुष्य से मिल सके। यही इस काव्य-संग्रह की सबसे बड़ी उपलब्धि है।