उपहार तुम्हें क्या दूँ माँ

जन्म से कुपित ,
अभिशाप से जीवन,
जीवंत सी अग्नि हूँ,
हाँ मैं नारी हूँ,
समाज की चीज,
उपभोग की नियति,
हर पल बिकती हूँ,
हाँ मैं नारी हूँ
शब्दों की मर्यादा,
किसी की आन,
जीव से ज्यादा सम्मान हूँ,
हाँ मै नारी हूँ,
रुपयों में तोलते,
हर गली में नोचते,
हर पल सिसकती हूँ,
हाँ मैं नारी हूँ,
बराबरी है अपमान,
पर घर की मान,
रोज मैं तोड़ी जाती हूँ,
हाँ मैं नारी हूँ,
मुझसे जो उपजे,
मुझपे ही गाली बरसे,
माल, आइटम या समान हूँ,
हाँ मैं नारी हूँ,
गाँव शहर में पूजते,
कूड़े नाली में फेंकते,
दुर्गा काली जैसी देवी हूँ
हाँ मैं नारी हूँ,
सोच तो मोड़ते,
मुझे नारी रहने देते,
मैं कोई बेचारी नहीं हूँ,
मैं अनन्त असीम ऊर्जा स्वरूप नारी हूँ।।