सिसकती जिंदगी
खाट पर पड़ी पड़ी दिन रात सिसकती जिंदगी
क्या फायदा ज़ी के ऐसी, सिर्फ धड़कती जिंदगी।
जिंदा लाश बन बिस्तर पे चौबीस घंटे लेटे लेटे
मौत ही के इंतज़ार में पल पल गुजरती जिंदगी।
लोक लाज की वजह से परिवार जिसे ढोता फिरे
अपने मल-मूत्र में लिथड़ती-फिथड़ती जिंदगी।
घर के एक कोने में लावारिस सी, दी जाये सरका
क्या हासिल होता ज़ी कर के, यूँ खटकती जिंदगी।
अपनी तो बन ही गई, परिवार की भी बना दे नर्क
जिंदगी का बोझ ढ़ोती, अपमान सहती जिंदगी।
उठा लेने को खुदा से, घर वाले लगें करने प्रार्थना
कुछ न कह के भी बहुत कुछ, कह जाती जिंदगी।
आत्महत्या के ही विचार, जब रात दिन आने लगें
ऐसे माहौल में घुटी घुटी, जीनी पड़ जाती जिंदगी।
मौत ही नज़र आने लगे जब सब मर्ज़ों का इलाज़
जिंदगी में फिर से उमंग, नही भर सकती जिंदगी।
जिंदगी में दुःख, दर्द, संघर्ष, परेशानियां देना बेशक
पर न देना मेरे मौला किसी का मुँह तकती जिंदगी।
जिंदगी बस उतनी ही हो, जीने का जिसे आये मज़ा
छोटी ही सही पर हो वो एक, चलती-फिरती जिंदगी।
जानता है ये ‘शर्मा’ बाखूबी, मांगने से न मिलता कुछ
डरता रहता, पड़ जाए न जीनी जबरदस्ती जिंदगी।
