मणिकर्णिका
ब्राम्हण कुल में जन्मी,
एक कन्या निराली थी।
नाम था मणिकर्णिका,
मनु नाम से जानी जाती थी।
शस्त्र शास्त्र की शिक्षा लेती,
अद्भुत चंचल छबीली थी।
बरछी ढाल कृपाण कटारी,
उसको यही लुभाती थी।
युद्ध कला में निपुण,
खेल खेल मे रणकौशल दिखलाती थी।
गंगाधर राव से विवाह हुआ,
झांसी की रानी लक्ष्मीबाई थी।
चहुं ओर बजे ढोल नगाड़े,
मंगल बेला आई थी।
राजा का स्वर्गवास हुआ,
रानी को खुशियां न भायी थी।
झांसी पर कब्जा करने की,
तब अंग्रेजो ने योजना बनायी थी।
अपनी झांसी नही दूँगी,
रानी ने मन मे ठानी थी।
स्वयं वीरता का अवतार,
वह साक्षात भवानी थी।
रणभूमि मे तांडव मचाती,
रणचंडी का रुप थी।
अंग्रेज़ो की मौत बन,
मर्द बनी मर्दानी थी।
बुझती झांसी का,
आखिरी चिराग थी।
युद्ध भूमि मे जब चलती,
उसकी तलवार पुरानी थी।
पवन वेग से घोङे पर सवार निकल पड़ी,
आजादी की प्यासी थी।
अंग्रेजो को मारते काटते आगे बढ़ती,
नारी या दुर्गा का अवतार थी।
अदम्य साहस से आखिरी सांस तक लड़ी,
स्वतन्त्रता की चिंगारी थी।
घायल होकर गिरी सिंहनी,
उसे वीरगति अब पानी थी।
अमर हो गई इतिहास मे वो,
झांसी की रानी लक्ष्मीबाई थी।
