बाबा साहब
ग़ुलामी की जंजीर को तोड़ते चल दिए,
अंधेरों से लड़कर उजाले बुनते चल दिए।
जहाँ बोलने का भी हक़ था नहीं हमें,
वहीं मंच पर हक़ के नारे गूँजते चल दिए।
जो शोषण में दबकर सिसकते रहे सदा,
उन्हें साथ लेकर वो रस्ते चुनते चल दिए।
क़लम को हथियार बनाया हक़ के लिए,
अधिकार की बातों में शोले धधकते चल दिए।
धर्मों से परे एक मानव धर्म रचाया,
समानता के दीप सब दिल में जलते चल दिए।
संविधान की इबारत में जज़्बा था उनका,
कानून में इंसाफ़ के मोती जुड़ते चल दिए।
न कोई बड़ा था, न कोई छोटा वहाँ,
जहाँ बाबा साहेब के सिद्धांत चलते चल दिए।
“गौतम” ये मत सोचो कि वो बस किताबों में हैं,
हर दिल में अम्बेडकर बनकर धड़कते चल दिए।
