इश्क़ का मुसाफिर जगमोहन गौतम 'मुसाफ़िर' इश्क़ की राहों में मुसाफिर बन चले,दिल के सहरा में वो जादूगर बन चले।हर कदम पर बस उसी की बात बस्ती,ख्वाब की दुनिया में वो बस्ती-बस्ती जले।आँखों में उसकी है कशिश का आलम,हर नज़र में बस वही मंज़र बन चले।दिल की धड़कन में सदा उसकी गूँज,हर साँस में वो जैसे गीतों में ढले।जगमोहन, इश्क़ का ये सैर-सपाटा,मुसाफिर के दिल तुझ में ही ठहर चले।