इन्क़लाब की रोशनी जगमोहन गौतम 'मुसाफ़िर' ज़ुल्म की ज़ंजीर को तोड़ने चला कोई,अंधेरों में हक़ की लौ जोड़ने चला कोई।क़लम उठी तो तूफ़ाँ डर से कांप उठा,जैसे सच का चेहरा मरोड़ने चला कोई।जो चुप थे सदियों से, अब आवाज़ बन गए,भीम जैसा सपना संजोने चला कोई।जिन्हें समझा गया था मिट्टी का एक ज़र्रा,वो पत्थर बनकर इतिहास खोदने चला कोई।न्याय, समता, बुद्ध की राह पे चल पड़ा,मनु की दीवारें भी तोड़ने चला कोई।अब भी दिल में रोशनी है उसी चराग़ की,“गौतम” फिर से उसको ओढ़ने चला कोई।