तुझको मालूम नहीं जगमोहन गौतम 'मुसाफ़िर' तुझको मालूम नहीं देख ले इक दिन आकर हिज्र में तेरे बिना कैसे जिया करते हैं।अब जुदाई मे तेरी ऐसे बसर होती हैं चांदनी रात में तारों को गिना करते हैं। दूर जा बैठे है जो लूट के इस दिल का सुकू, रात भर वो हमें ख्वाबों में दिखा करते हैं।दर्द मत पूछ बिछड़ने का तू हम से ‘गौतम’ हर घडी हिज्र के लम्हात गिना करते हैं।