मैं

मैं
इंसान नहीं
बहुरूपिया हूँ,
दिल से कुछ और
दिमाग से कुछ और
आँखों से कुछ और,
अपनों से कुछ और
गैरों से कुछ और
अकेले में कुछ और,
भीड़ में कुछ और,
मंदिर में कुछ और
घर में कुछ और,
जिंदा हूँ तो कुछ और
मर जाऊं तो कुछ और,
मैं
इंसान नहीं,
बहुरूपिया हूँ।