आदमी के लिए है क्या औरत बलजीत सिंह 'बेनाम' आदमी के लिए है क्या औरतमाँ बहन और प्रेमिका औरत।वो ही सीता वही अहिल्या भीफिर क्यों सदियों से बेवफ़ा औरत।लौट कर कब है आ सकी इज्ज़तघर की दहलीज़ से न जा औरत।ज़िन्दगानी बनी किसी के लिएतो किसी के लिए क़ज़ा औरत।आदमी और इक फ़रिश्ते केदरमियाँ कोई आईना औरत।