आदमी के लिए है क्या औरत

आदमी के लिए है क्या औरत
माँ बहन और प्रेमिका औरत।

वो ही सीता वही अहिल्या भी
फिर क्यों सदियों से बेवफ़ा औरत।

लौट कर कब है आ सकी इज्ज़त
घर की दहलीज़ से न जा औरत।

ज़िन्दगानी बनी किसी के लिए
तो किसी के लिए क़ज़ा औरत।

आदमी और इक फ़रिश्ते के
दरमियाँ कोई आईना औरत।