उसे पाने को बेघर हो गए हैं बलजीत सिंह 'बेनाम' उसे पाने को बेघर हो गए हैंहदों से अपनी बाहर हो गए हैं।रहमदिल कल तलक़ जो भी रहे थेसुना है सब सितमगर हो गए हैं।मेरे ज़ख्मों पे मरहम के बहानेतुम्हारे बोल नश्तर हो गए हैं।कभी मिलने नहीं आते हैं ज़ालिममहज़ वादे मुक़र्रर हो गए हैं।चलो बेनाम निकलो इस नगर सेयहाँ के लोग पत्थर हो गए हैं।