थार की मिट्टी

चमकती
थार की मिट्टी
ले हवा का सहारा
उड़ जाती है दूर-दूर तक
कण-कण से बदलती
रूप अपना।

चलती हवा में
बिखर जाती है
धीरे से
स्थान अपना बना लेती है
जग से न्यारी
थार की मिट्टी ।

सानिध्य पा
सूरज की किरणों का
स्वर्ण रूप बना लेती है
थार की मिट्टी ।

लोहे जैसी
तप जाती है
वीरों की बलिदानी
इस भूमि पर
थार की मिट्टी ।

इस भूमि पर
ऊँटो की सवारी है
सारे जग से न्यारी है
थार की मिट्टी ।