1857 की जनक्रांति के अमर योद्धा — युवराज लाल प्रताप सिंह

युवराज लाल प्रताप सिंह

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1857 की क्रांति भारतवर्ष की वह ज्वालामुखी थी, जिसमें हर जाति, धर्म और क्षेत्र के लोगों ने अपनी आहुति देकर उसे जनक्रांति का स्वरूप प्रदान किया। परंतु इस महान संग्राम के कई ऐसे वीर सेनानी भी थे, जिनका तेजस्वी योगदान इतिहास के पृष्ठों में धुंधला सा पड़ा रह गया। ऐसे ही एक दिव्य योद्धा थे — युवराज लाल प्रताप सिंह। प्रतापगढ़ की कालाकांकर रियासत के जयेष्ठ युवराज, जो मात्र 26 वर्ष की आयु में चांदा की ऐतिहासिक लड़ाई में अमर शहीद हो गए।

कालाकांकर का सिंह गर्जन-
सन् 1831 में जन्मे लाल प्रताप सिंह का जीवन साहस, समर्पण और स्वाभिमान की जीवंत मूर्ति था। 1857 की क्रांति जब अपने चरम पर थी, तब अवध की शासिका बेगम हज़रत महल ने अंग्रेज़ सेनानायक जनरल नील को लखनऊ पहुँचने से रोकने हेतु कालाकांकर नरेश और अमेठी के राजा को आह्वान भेजा। इस पुकार पर युवराज लाल प्रताप सिंह ने अपने प्राणों की बाज़ी लगाते हुए चांदा की धरती पर संघर्ष की हुंकार भरी।

अपने पिता राजा हनुमंत सिंह से आदेश पाकर वे अपने साथ सैकड़ों सिपाहियों, दलित-दमित कृषकों, श्रमिकों, देशप्रेमी मल्लाहों और आमजन की टोलियों को लेकर मोर्चे पर पहुंचे। अक्टूबर 1857 के अंत में चांदा और अमेठी की धरती अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध ललकार बनकर उठ खड़ी हुई।

चांदा की महागाथा-
चांदा की लड़ाई महज़ एक सैन्य टकराव नहीं थी — वह स्वराज्य का घोष, और जनशक्ति का ज्वार थी। अंग्रेज़ों के पास तो तोपें, बंदूकें और संगठित सैन्यबल था, लेकिन बागियों के पास था — अविचल आत्मबल, धर्मनिष्ठ देशभक्ति, और जनसमर्थन की महाशक्ति। इस युद्ध में 20,000 से अधिक लोगों ने भाग लिया, जिनमें किसान, मजदूर, युवक, वृद्ध, सभी सम्मिलित थे।

लाल प्रताप सिंह ने युद्धभूमि में ऐसी वीरता का प्रदर्शन किया कि अंग्रेजों की अग्रगण्यमान सेना सन्न रह गई। चांदा उनके लिए एक वाटरलू सिद्ध हुआ। लेकिन दुर्भाग्यवश, 19 फरवरी 1858 को अत्यंत विषम परिस्थितियों में, लाल प्रताप सिंह रणभूमि में वीरगति को प्राप्त हुए। उन्हीं के साथ उनके चाचा राजा माधव सिंह भी शहीद हो गए।

लोकगाथाओं में अमर नाम-
चांदा की लड़ाई आज भी प्रतापगढ़ के लोकगीतों, कजरी-चैती की स्वरधारा और जनश्रुतियों में जीवंत है। गाँव-गाँव में आज भी गाया जाता है:

“काले कांकर का बिसेनवा, चांदे गाड़े बा निसनवा…”
(कालाकांकर का बिसेन राजकुमार, चांदा में गाड़ आया अपना विजय ध्वज।)

रामपाल सिंह: पिता के पदचिन्हों पर-
शहादत के बाद उनके पुत्र राजा रामपाल सिंह (1848–1909) ने न केवल आज़ादी की अलख जगाए रखी, बल्कि पत्रकारिता और जनजागरण के क्षेत्र में भी अमूल्य योगदान दिया। उन्होंने 1885 में कालाकांकर से हिंदी का प्रथम दैनिक पत्र “हिंदोस्थान” प्रकाशित किया — जब वहां तारघर तक नहीं था! इसी अखबार के लिए तार लाइन बिछाई गई, और रायटर एजेंसी से समाचार भी लिए गए।

हिंदोस्थान के पहले संपादक बने पंडित मदन मोहन मालवीय। उनके बाद भी अनेक विद्वान—पंडित प्रतापनारायण मिश्र, बालमुकुंद गुप्त, गुलाबचंद्र चौबे, शशिभूषण चटर्जी—इस मिशन में सहभागी बने।

कालाकांकर राज का उज्ज्वल उत्तराधिकार-
कालाकांकर राजवंश का मूल गोरखपुर के मझौली ग्राम में था। 1193 में राय होममल्ल का राज्याभिषेक हुआ। अनेक युग बीतने के बाद जब राजा हनुमत सिंह कालाकांकर के शासक बने, तब यह रियासत स्वतंत्रता संग्राम का अग्रणी केंद्र बनी। महात्मा गांधी और पंडित नेहरू तक इस राजसी धरा की राजनीतिक चेतना से प्रभावित हुए।

विस्मृति में लिपटा बलिदान-
आज विडंबना यह है कि कालजयी वीर लाल प्रताप सिंह की शहादत की स्मृति में चांदा में कोई स्मारक नहीं है। हां, कालाकांकर में अवश्य “प्रताप द्वार” बना है, परंतु इतिहास की मुख्यधारा में अब भी उनका नाम वह स्थान नहीं पा सका, जिसके वे यथार्थ अधिकारी थे।