कैसा हुआ सफर

जिंदगी का जाने यह कैसा हुआ सफर
भाग रहा है हर इंसान क्यों बिना डगर।

सरल सी दुनिया बन गई है मकड़जाल
मंजिल का पता नहीं भटक रहा दरबदर।

सुख, सम्पदा, समृद्धि, सब धरा रह जाएगा
क्यों दौड़ रहा बेतहाशा पसीने से तरबतर।

खुदा तू बक्श रहमत तेरे नाखुदा बंदे पर
जो खुद को भूला न अपनों की खैर खबर।