मैं बस ख़ुदा चाहता हूँ

झुलसती धरा पर शबनम बूंदों की छटा चाहता हूँ
खुले आसमां में हर समय सावन की घटा चाहता हूँ।

कैसा जमाना है इंसान पत्थर का बुत बना रहा है
इसी पत्थर के बुत में धड़कता इन्सान चाहता हूँ।

क्यों लोग हैं दुश्मनी को अपना ईमान समझते हैं
मेरे दुश्मन तुझसे मैं दोस्ती की ख़ता चाहता हूँ।

बन्द करो खूनी दरिन्दों यहू सरजमीं की लड़ाई
काफि़रों के दिल में भी मैं बस ख़ुदा चाहता हूँ ।।