मैं बस ख़ुदा चाहता हूँ डॉ लाल थदानी झुलसती धरा पर शबनम बूंदों की छटा चाहता हूँ खुले आसमां में हर समय सावन की घटा चाहता हूँ।कैसा जमाना है इंसान पत्थर का बुत बना रहा हैइसी पत्थर के बुत में धड़कता इन्सान चाहता हूँ।क्यों लोग हैं दुश्मनी को अपना ईमान समझते हैंमेरे दुश्मन तुझसे मैं दोस्ती की ख़ता चाहता हूँ।बन्द करो खूनी दरिन्दों यहू सरजमीं की लड़ाईकाफि़रों के दिल में भी मैं बस ख़ुदा चाहता हूँ ।।