ऐ वक़्त
ऐ वक़्त,
ज़रा ठहर क्यों नहीं जाता?
हर लम्हा मुझसे,
कुछ ना कुछ छीन ले जाता।
तेरी रफ़्तार में
हर पल कुछ दूर हो रहा,
जो पास था कभी,
अब कहीं खोता जा रहा।
तू क्यों नहीं सुनता,
दिल की यह दबी पुकार?
थोड़ी देर ही सही,
थम क्यों नहीं जाता, एक बार?
कुछ बिखरे हुए रिश्ते,
जिन्हें तू जोड़ न पाया,
कुछ अधूरे सवालों के जवाब
लेकर, तू क्यों न आया?
कभी तो पलट कर देख,
क्या छूटा पीछे?
कुछ रिश्ते अब भी,
पीछे की ओर हैं खींचे।
पल दो पल के लिए ही सही,
क्या रोक नहीं सकता अपनी रफ़्तार?
बीते पलों में लौट कर, मैं भी
जी भर जी लूँ फिर से एक बार।
मैंने पूछा तुझसे
क्या तू थकता नहीं ?
या चुपचाप बस
चलता ही रहेगा… यूँ ही?
तेरी खामोशी भी
बहुत कुछ कह जाती है,
हर बिछड़न में
इक बेबसी नज़र आती है।
