रिश्तों का मोल
भीड़ में रिश्तों की परछाइयाँ न ढूँढें,
रिश्ते ऐसे बनाएँ, जो दिल से हो जुड़ें।
चाहे गिने-चुने लोग हों जीवन में साथ,
पर हों पास, ज़रूरत में थामने को हाथ।
कारवाँ ऐसा हो, ख़ामोशी भी पढ़ सके,
ख़ुशियों में शामिल हो, संग मुस्कुराए।
ग़म में चुपचाप आकर हाथ थाम लें,
जुगनू बन धुँधली रात में राह दिखाए।
गिनती में कम हों, मगर दिल के हो पास,
जब मिले, गहरा हो जुड़ाव का विश्वास।
अपनापन ऐसा जैसे मिश्री की मिठास,
ना हो मिलने के लिए ज़रूरतों की तलाश।
ना कोई दिखावा, ना हो स्वार्थ की बात,
बराबरी की हो कोशिश, रहने की साथ।
नाम भर के लिए जुड़ने से रिश्ता बने कहाँ?
मिलने की चाह भी न हो — वो कैसा जहाँ?
