मदन मोहन 'मैत्रेय'
मदन मोहन “मैत्रेय” का जन्म बिहार राज्य के दरभंगा अनुमंडल अंतर्गत रतनपुर गाँव में एक साधारण परिवार में हुआ। कठिन आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद आपने शिक्षा प्राप्त की और साहित्य के प्रति आपकी ललक बाल्यकाल से ही परिलक्षित होती रही। यही ललक धीरे-धीरे आपकी पहचान बन गई और ईश्वर की कृपा से वर्ष 2022 में आपकी चार महत्वपूर्ण रचनाएँ प्रकाशित हुईं, जिनमें तीन उपन्यास और एक काव्य-संग्रह शामिल है। आपकी लेखनी समाज की ज्वलंत समस्याओं, युवाओं की मनोदशा, और सामाजिक सरोकारों को रचनात्मक ढंग से प्रस्तुत करती है।
बाल-हठ (कहानी )
रचित जब से ऑफिस से लौटा था, परेशान था — बहुत परेशान। क्योंकि उसका बेटा संकल्प, जो अभी मात्र आठ वर्ष का था, ज़िद ठाने बैठा था। और वह भी कोई साधारण ज़िद नहीं, बल्कि एंड्रॉयड फोन दिलवाने की ज़िद। बस, रचित के क्रोध का पारा चढ़ गया था। हाँ, जब वह ऑफिस के लिए निकल रहा था, तभी उसकी इच्छा हुई थी कि संकल्प को खींचकर एक थप्पड़ जड़ दे, परंतु… वह ऐसा नहीं कर सका, क्योंकि संकल्प उसके घर का इकलौता वारिस था। ऐसे में यह स्वाभाविक ही था कि परिवार में वह सबकी आँखों का तारा हो — ख़ासकर उसका और उसकी पत्नी मेघना का। ऐसा कहना गलत नहीं होगा कि अगर संकल्प को ज़रा-सी भी ठेस लगती, तो दोनों विकल हो जाते। इतना ही नहीं, अगर उसने ज़ुबान से कोई चीज़ माँगी नहीं कि उसकी पूर्ति कर दी जाती। ऐसे में यह कहना उचित होगा कि रचित के मन में हमेशा यही इच्छा रहती थी कि उसका बेटा राजकुमार की तरह पले-बढ़े। इसीलिए तो उसने गाँव छोड़ दिया था और शहर आकर एक मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी करने लगा था। दिन-रात जी-तोड़ मेहनत करता था — परिवार के लिए सुख-सुविधाएँ जुटाने के लिए, ख़ासकर संकल्प के लिए। लेकिन आज उसी बेटे की ज़िद ने उसे अस्त-व्यस्त कर दिया था। तभी तो ऑफिस में उसका मन नहीं लगा, और काम पूरा होने के बाद भी वह जल्दी निकल आया। उसे मालूम था, संकल्प जिद्दी है। ऐसे में वह अपनी बात मनवाने के लिए तमाम हथकंडे अपनाएगा — जैसे भोजन न करना, या रो-रोकर घर सिर पर उठा लेना। हालाँकि मेघना ने उससे कहा भी था —
“संकल्प तो बच्चा है, ज़िद कर रहा है। आप भी नादानी कर रहे हैं, यह आप पर शोभा नहीं देता। बेहतर होगा कि उसकी बात मानकर उसे मोबाइल दिला दीजिए।”
लेकिन नहीं — रचित जानता था इस उम्र में बच्चे के हाथ में मोबाइल देने का परिणाम। उसने दृढ़तापूर्वक सोच रखा था — चाहे जो भी हो जाए, वह संकल्प की इस ज़िद के आगे नहीं झुकेगा।
वह भलीभाँति जानता था कि इस उम्र में मोबाइल देना अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है। आज तेज़ इंटरनेट का ज़माना है, जहाँ एक उँगली के इशारे पर तमाम तरह का कंटेंट सामने आ जाता है। ऐसे में बच्चों के बिगड़ने में देर नहीं लगती।
“नहीं… मैं ऐसा जोखिम नहीं ले सकता,” उसने खुद से कहा और सूख चुके होंठों पर जीभ फेरी। फिर सोफे पर संभलकर बैठ गया। उसकी नज़र कलाई की घड़ी पर पड़ी — शाम के सात बजने वाले थे।
टन… टना… टन… टन!
एक कर्णवेधक आवाज़ — जो किचन से आई थी और हॉल में गूंज गई। रचित की तंद्रा टूटी और उसे लगा जैसे हौसले का दामन उसके हाथों से छूट गया हो। वह समझ गया — किचन में कोई बर्तन गिरा नहीं, बल्कि जानबूझकर पटका गया है। और वह जानता था — ऐसा काम उसकी धर्मपत्नी ही कर सकती है।
बस, इतना ही काफी था उसकी धड़कनें बढ़ाने के लिए। वह समझ गया कि मेघना गुस्से में है। संकल्प के चेहरे पर थोड़ी-सी भी मायूसी वह बर्दाश्त नहीं कर सकती।
वह सोचने लगा —
“वह चाहती होगी कि उसकी ज़िद पूरी कर दी जाए, परिणाम चाहे कुछ भी हो।”
लेकिन वह माँ नहीं, पिता था — और भावनाओं में बहने से पहले दुनियादारी भी समझता था।
वह जानता था कि भले ही मामला बिगड़ गया हो, लेकिन समय बीतने के साथ सब शांत हो जाएगा — बस थोड़ी-सी कोशिश करने की ज़रूरत है। यही सोचकर वह सोफे से उठा और किचन की ओर बढ़ गया। सभी लाइटें जलाईं — किचन में पहुँचते ही उसने देखा कि सारी वस्तुएँ अस्त-व्यस्त पड़ी थीं। शायद मेघना ने आवेश में आकर किचन की यह दुर्दशा की थी। लेकिन अभी समय नहीं था इस पर बात करने का। अभी ज़रूरत थी कि मेघना को कैसे भी करके मनाया जाए। उसके मन में जो क्रोध की ज्वाला भड़क रही थी, उसे शांत किया जाए। उसने अपनी वाणी में मधुरता लाकर कहा —
“मेघना… अरी ओ मेघना…”
मेघना पलटी — हाथों में गिलास लिए हुए। वह सुंदरता की मूरत थी, लेकिन इस समय आवेश के कारण उसका अप्रतिम सौंदर्य फीका पड़ गया था। रचित अंदर से काँप गया। परंतु मेघना को उसकी इस मानसिक स्थिति से कोई सरोकार नहीं था। उसने भरपूर नज़रों से उसकी ओर देखा और तल्ख़ लहजे में बोली —
“लो, ये दूध का गिलास… संकल्प को पिला दो। वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दूँ — वह सुबह से कुछ भी खाया-पिया नहीं है।”
कहकर उसने गिलास उसके हाथों में थमा दिया और पलटकर अपने काम में लग गई। रचित एक पल को वहीं जड़वत खड़ा रह गया — शायद परिस्थितियों को समझने की कोशिश कर रहा था। फिर उसने गिलास संभाला और संकल्प के कमरे की ओर बढ़ गया। वह जानता था — अब उसके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा है। अब उसे खुद ही जाकर बेटे को मनाना होगा।
कमरे में पहुँचते ही उसने संकल्प को गोद में उठा लिया और उसे बहलाने-फुसलाने लगा। उसे तरह-तरह के लालच देने लगा — फिर उसके हाथों में दूध का गिलास थमाया।
और तभी —
टन… टन… टना… टन!
गिलास फर्श से टकराया और दूर तक लुढ़कता चला गया। रचित के भीतर आवेश की लहर दौड़ गई। एक पल को उसकी आँखों के आगे अँधेरा छा गया। उसने मन ही मन चाहा — “अभी एक ज़ोरदार थप्पड़ लगा दूँ…”
तभी किसी ने उसके हाथों से संकल्प को ले लिया। उसने ऊपर देखा — उसके पिता ललित बिहारी थे। वे संकल्प को गोद में लिए मुस्कुरा रहे थे। रचित का मन पलभर में शांत हो गया।
वह झुककर बोला —
“पाँय लागूँ, बाबूजी…”
“खुश रहो, रचित!” — उन्होंने स्नेहपूर्वक आशीर्वाद दिया। फिर तनिक रुष्ट होकर बोले —
“क्या बात है, रचित? संकल्प ने गुस्से में दूध का गिलास क्यों फेंका?”
रचित बोला —
“पिताजी, बात ये है कि संकल्प एंड्रॉयड फोन लेने की ज़िद कर रहा है…”
उसने सुबह से लेकर अब तक की पूरी बात बता दी। ललित बिहारी मुस्कुराए, फिर बोले —
“तो ये बाल-हठ का मामला है।”
“जी पिताजी…” — रचित झिझकते हुए बोला।
ललित बिहारी ने संकल्प की आँखों में देखा और बोले —
“तो इसका मतलब है, मैं सही समय पर आया हूँ। इसमें बुराई क्या है? अगर संकल्प को फोन चाहिए, तो उसे मेरे साथ गाँव चलना होगा। वहाँ कुछ दिन हमारे साथ रहेगा, फिर मैं खुद इसे एक अच्छा फोन दिला दूँगा।”
उनकी बात सुनकर संकल्प की आँखों में उत्साह चमक उठा। रचित भी मन ही मन प्रसन्न हो गया। उसे विश्वास था कि उसके पिता सुलझे हुए इंसान हैं — और संकल्प को कुछ दिन उनके साथ भेज देना ही उचित होगा। रास्ता मिल गया था। वह पिताजी के साथ हॉल में आया और सेवा के भाव से किचन की ओर बढ़ गया। वहीं, ललित बिहारी सोफे पर बैठकर संकल्प के साथ खेलने लगे।
