डॉ मोहन लाल अरोड़ा

मै एक छोटा सा डाक्टर हमेशा मरीजों के दुख दर्द में रहा और उनकी सेवा मे लगा रहा बदले में मुझे बहुत सारा आशीर्वाद प्यार और धन के इलावा इज्जत और नाम भी मिला। समाज सेवा में जुड़े और सम्माननीय लोगों से मिलना हुआ, लिखने और बोलने का मौका मिला। जिसको मैने दिल से स्वीकार किया और कलम पकड़ कर अपने दिल से लिख डाला। आज आपलोगों के बीच एक कवि के रूप में हाजिर हूँ। दुख और दर्द से दिल का नाता है, इस लिए दर्द भरी रचना मन से लिखी जाती है। आप पसंद करते हैं तो हमारी कलम की धार भी तेज होती हैं और अपनी लेखनी को सफल बनाती है।

मेरी बेटी मेरा अभिमान

मै एक सरकारी अस्पताल मे फार्मासिस्ट की पोस्ट पर कार्यरत हूँ। मेरा एक बेटा है और उससे 5 साल छोटी एक बेटी है। बेटी होने से घर मे रौनक ऐसे बढ़ी की जैसे हमारे परिवार का कायाकल्प ही बदल गया… घर से सारे दुख दर्द मिट गए,…कुछ बैंक का कर्ज था वो भी जल्द ही उतर गया…. मानो घर में बेटी नही साक्षात लक्ष्मी का अवतार आई हो। मै तो हमेशा उसे देखता ही रहता डयूटी पर मन ही नही लगता बस बेटी के लिए उदास रहता रात को भी अपनी छाती पर ही सुलाता। श्रीमती जी का दूध भी नही उतरा तो बकरी का,कभी गाय का दूध ला कर देता। पता नही क्यों बेटी के किसी भी काम की देरी नही होने देता उसके लिए सब कुछ करने में खुशी होती,परिवार वाले तो मुझे सनकी ही समझने लगे। वास्तव में मै अपनी बेटी मे अपने आप को देखने लगा… थोड़ी सी बड़ी हुई तो बिल्कुल मेरा बचपन का चेहरा ही दिखता। मैं सब कुछ भूल कर बस अपनी बेटी मे मगन हो गया और वह मेरे बेटे की तरह पलने लगी दोनो बहन भाई खूब खेलते कभी लड़ते झगड़ते तो डाँट सिर्फ बेटे को ही पड़ती क्योंकि वो बड़ा भी था और बेटी तो जैसे मेरी जान थी मैने अपनी पूरी जिंदगी में कभी भी उसे ना डाँटा और ना ही किसी को डाँटने दिया। जैसे जैसे बड़ी होती गई पढ़ाई में बहुत होशियार और सयानी होती गई। अपनी मम्मी और दादी के संस्कार पाकर मेरे प्यार की छांव में कब बड़ी हो गई पता ही नही चला। बहुत सुंदर और समझदार थी….कभी कभी मुझे भी डाँट देती लगता जैसे मेरी दादी है ….. । बेटा बड़ा था उसे डाक्टर बनाने में बहुत खर्च हो गया और कर्ज भी लेना पड़ा। धीरे धीरे कर्ज उतर रहा था। इतने में बेटी के मेडिकल कॉलेज में एडमीशन के लिए पैसे चाहिए थे…सभी परिवार वाले कहते इसे डाक्टर मत बनाओ… बहुत खर्च होता है …इतने मे तो इसकी शादी हो जाएगी। मैने सभी परिवार वालो की सुनी तो मेरी बेटी ने पूछा… पापा… बेटी बेटा में क्या फर्क है…! भैया को तो सभी डाक्टर बनाना चाहते थे। मै लड़की हूँ तो सब शादी की बात कर रहे हैं ….मै कुछ भी जवाब देने की स्थिति में नही था और अपनी छाती के साथ लगा कर रो पड़ा और बोला तू भी मेरा बेटा ही है। ….

मै तुझे जरूर डाक्टर बनाऊगा चाहे कोई कुछ भी कहे । हर समय भगवान से प्रार्थना करने लगा और अपने कार्य में और भी ज्यादा मेहनत करने लगा कि कुछ रुपया जुड़ जाए तो बेटी भी डाक्टर बन जाए। भगवान ने मेरी सुनी और मेरी भाग्यशाली बेटी का सरकारी कोटे से नंबर आ गया और कम पैसो से वो भी डाक्टर बन गई मै तो जैसे गंगा ही नही लिया। मेरे दोनो बच्चों के पास एक समान डिग्री थी जिसके कारण मेरी बेटी के मन में यह भावना कभी नही पनपने पाई कि बेटा बेटी में कोई फर्क होता है। मेहनत और लगन से से भगवान भी खुश होते हैं। मेरे लिए अभिमान का सबसे बड़ा दिन तब आया जब मेरी बेटी मेरे ही हॉस्पीटल में मेरी ही अफसर बन कर आई….सभी परिवार और शहर वालों ने मुझे और मेरी बेटी को ‘मेरी बेटी मेरा अभिमान’ की बधाई दी और कहा कि ईश्वर ऐसी सुशील और भाग्यशाली बेटी सब को दे।