दरवाजे के बाहर निकलो

दरवाजे के बाहर निकलो
सिंहद्वार से बाहर जरूर निकलो
आसमां छुआ है कि नहीं
इतिहास नहीं पूंछेगा
मानता हूँ
उड़ान भरने वाले कहां मानते हैं
किसी का कहना
उड़ते हुए दिखना चाहते हैं खुद को
रोजी स्टार्लिंग की तरह
लॉकडाउन में
अनलॉक अल्फ़ाजों की तरह
सबसे अलग कुछ करना चाहते हैं
जंगल उगाते हैं
दिमाग में सोते जागते
स्वप्न देखते रहते हैं
अपनी दुनिया रचते हैं
खूबसूरत जंगल रचना चाहते हो
पौधे रोपते रहो
सींचते रहें
सबसे सुन्दर जंगल तुम ही बनाओगे
मौसम एक सा नहीं रहेगा
हवा ने रूख अख्तियार कर लिया है
लांघते हो दरवाजे की दहलीज
अच्छी बात है तुम
दरवाजे के भीतर से बाहर निकल गए हो
प्रकृति सदा एक सी नही होती
आसमां का रंग बदलता रहता है
दरवाजे भी बदलते रहते हैं
रात भी होगी
सूरज भी उगेगा
शाम भी होगी
आसमां सुर्ख भी होगा
नदी सूखी है आज
कल पानी से लबालब भी होगी
कल सैलाब उमड़ा तो
रेत के घर का डूबना भी तय है
सोचना मत
घर बनाओ अभी नदी सूखी है
ख्वाब सजाओ
दरवाजे के भीतर से बाहर निकलो…।