स्याही, सत्ता और शवपत्र

स्याही के कफ़न में लिपटा चुनाव पड़ा था—
लोग झुककर पूछ रहे थे,
“ज़िंदा है…
या फिर से किसी नेता की जेब में नौकरी करने चला गया?”
लोकतंत्र बोला—
“मैं मरता नहीं,
बस फाइलों के बीच बेमौत दबा दिया जाता हूँ।”
शिकायत लिखने वाला
खुद ही चुनाव लड़ रहा था—
जनता ने पूछा, “ये कौन-सी नैतिकता?”
मैंने कहा— “भाई, यह नहीं उम्मीदवार है,
नैतिकता का स्पेशल इफ़ेक्ट टेक्नीशियन है।”
हार गया तो बोला—
“सूची काली थी।”
जीत जाता तो चिल्लाता—
“हम उजले घराने से हैं।”
लोकतंत्र ने माथा पीट लिया—
“मेरी हत्या का आरोप किस पर लगाऊँ?
यहाँ तो हत्यारा भी पीड़ित बनकर प्रेस कॉन्फ़्रेंस करता है।”
नए सदस्य—
कागज़ पूरे वैध,
चेहरे सत्ता की नज़र में PDF अपराधी।
कवि बोला—
“यहाँ न्याय शक्कर है—
मिठास उन्हीं को मिलती है
जो चायदानी लेकर पहुँचते हैं।”
चुनाव आयोग आया,
इतना आया कि कमरा काँप गया,
पर साहब ग़ायब—
पहाड़ियों में लोकतंत्र की ट्रेकिंग शांति खोजते हुए।
कुर्सी मौजूद थी,
ज़िम्मेदारी छुट्टी पर।
राजनेता बोले—
“घर के बर्तन टकराते हैं।”
हमने देखा—
बर्तन बेच दिए गए,
पर लड़ाई अभी भी EMI पर चल रही है।
एक समूह ईमानदार,
दूसरा “और भी ईमानदार।”
परिणाम—
चुनाव सीधे शवगृह में भर्ती।
स्याही चिल्लाई—
“कलमें नहीं लड़ रहीं,
कुर्सियों के पाये कुश्ती खेल रहे हैं।”
हर तरफ़ से आवाज़—
“मैं सही हूँ!”
लोकतंत्र थरथराया—
“कोई आग जलाओ,
मैं इन बहानों की ठंड में जमने लगा हूँ।”
पोस्टमॉर्टम में लिखा—
“शिकायतें पवित्र थीं,
नियम भस्म थे,
और सत्ता राख पोतकर पवित्रता का नाटक कर रही थी।”
संसद के बाहर लिख दो—
“स्याही ताज़ा है,
पर नीयत की बोतल एक्सपायर।”
और आख़िर में—
“लोकतंत्र तभी बचेगा
जब जनता अपने-अपने झूठों की लाशें दफ़ना देगी।”