बुद्ध ने कहा जो उत्पन्न हुआ है उसका जाना निश्चित है। मैंने वियोग में यह वचन नहीं, उसकी अनुभूति पाई। जो गया वह मुझसे अलग नहीं हुआ, वह अनित्यता में प्रविष्ट हुआ जैसे उपदेश मौन में लौटता है। दु:ख आया, बुद्ध मुस्कराए नहीं उन्होंने केवल दिखाया कि दु:ख भी कारणों से बंधा है। मैंने शून्यता को रिक्त नहीं पाया, वहाँ करुणा बैठी थी भिक्षु-सी, निरभिमान। अब किसी के रुकने की प्रार्थना नहीं, क्योंकि बुद्ध जानते हैं जहाँ आग्रह समाप्त होता है वहीं बोध आरंभ होता है।