शब्दों की मृत्यु
इस दशक में तीन शब्दों ने
अपना दम तोड़ दिया है।
पहला है—निष्पक्ष।
नदी का पानी जैसे
पत्थरों को घिस-घिसकर
उन्हें बालू में बदल देता है,
वैसा ही हश्र हुआ है
‘निष्पक्ष’ शब्द का—
अपनी मूल कठोरता,
अपना नैतिक तेज
सब खो चुका है।
दूसरा—स्वतंत्र।
वह स्वयं पूछ रहा है—
क्या सचमुच मेरा कोई वजूद बचा है?
व्यवस्थापिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका से
बहुत पहले ही
हम उसे खो चुके हैं।
चौथे खंभे की दुनिया में
उसकी अर्थी रोज उठती है—
टीवी चैनल और अख़बार
रोज उसे श्मशान ले जाते हैं,
और फिर भी उन्हें चैन नहीं मिलता।
तीसरा शब्द—पारदर्शी
यह पूरी तरह
तहस-नहस और क्षत-विक्षत हो चुका है।
जिसकी आँख फूट गई है
उसे ही ‘पारदर्शिता’ पर भरोसा रह सकता है;
जिन्हें आँखें मिली हैं
उन्हें तो इस पार कुछ दिखता ही नहीं।
फिर भी एक कारिंदा
अपने ‘ज्ञान’ से घोषणा करता फिरता है
कि लोकतंत्र में ये तीनों शब्द
निष्पक्ष, स्वतंत्र और पारदर्शी
अब भी जिंदा हैं।
