छटपटाता मन
मछली की तरह
जो जल से अचानक खींच ली जाए
और सूखी धरती पर
छटपटाती रहे
वैसे ही मन है।
विचारों की इस सूखी भूमि पर
वह कभी ठहर नहीं पाता,
एक तरंग से दूसरी तरंग,
एक आकांक्षा से दूसरी आकांक्षा,
एक भय से दूसरे मोह तक
भागता हुआ, काँपता हुआ
स्वयं को पहचानने से भी
दूर हो जाता है।
यही बेचैनी
यही भीतर की थरथराहट
‘मार’ का क्षेत्र है
वह अंधकार
जो हमें अपने ही भ्रमों में बाँध लेता है।
और इसलिए
मन को थामने का धैर्य चाहिए,
छटपटाहट के पार देखने की दृष्टि चाहिए।
जब मन अपने स्वभाव को पहचान लेता है
तो वह लौटने लगता है—
जल की शीतलता की ओर,
शांति की अपनी जन्मभूमि की ओर,
जहाँ कोई पकड़ नहीं, कोई भय नहीं,
केवल जागृति है।
