धर्मचक्र के समक्ष

पत्थर में ढली हुई श्रद्धा,
शांत दृष्टि में समाई करुणा,
भिक्षु नत हैं
विनय से भरे, मौन की भाषा में बोलते हुए।
आकाश में झुक आए हैं देवगण,
वायु भी थम-सी गई है,
मानो स्वयं समय ने
बुद्ध के उपदेश को सुनने को
क्षण भर को विराम लिया हो।
धर्मचक्र घूमता है
पर गति बाहरी नहीं,
यह तो भीतर का प्रवाह है
जहाँ अज्ञान गलता है,
और प्रकाश जन्म लेता है।
गांधार की छाया में
ग्रीक रेखाएँ मिलती हैं भारतीय आत्मा से,
पत्थर कहता है
संस्कृति सीमाएँ नहीं जानती।
एक भिक्षु घुटनों के बल
प्रणाम करता,
और उसकी झुकी हुई देह में
मानवता की संपूर्ण विनम्रता
मूर्त रूप ले लेती है।
धर्मचक्र घूमता रहता है
युगों के पार,
भक्ति के इस निःशब्द दृश्य में
शांति की अनंत ध्वनि गूँजती है।