नख़रे अब सनम के बढ़े जा रहे है धर्मेंद्र कुमार निवातिया नख़रे अब सनम के बढ़े जा रहे है,बिना बात फ़बते कसे जा रहे है !सितम का सितमगर के आलम है ऐसा, दिनों-दिन, वो सिर पर, चढ़े जा रहे है !बहाना हमेशा नया ढूंढ़कर वो, कभी भी, कहीं भी, लड़े जा रहे है !हक़ीक़त से नाता नहीं दूर तक पर,फ़साने नए नित गढ़े जा रहे है !नहीं कोई मुद्दा लड़ाई का लेकिन, वो बेबात फिर भी अड़े जा रहे है !शिकायत किसी से क्या अब करे हम, बचे बाल सर के झड़े जा रहे है !गए हार हम तो मनाते-मनाते,‘धरम’ से मगर वो भिड़े जा रहे है!!