धूप छांव की छाया देखी
काँटों से पथ रचाया जीवन,
धूप-छाँव की छाया देखी,
गिरी अनेकों बार थकाकर,
हर बार नई माया देखी।
आशा की जब लौ भी बुझी थी,
तम के गहरे आलिंगन में,
तब भीतर से स्वर उभरा
चल, अभी न रुक, बंधन में।
लगता था बस यही है जीवन,
दुख की साँकल, मौन कथाएँ,
पर आज किसी मधुर स्पर्श ने,
बिखरीं सुख की चुप आभाएँ।
किसी ने हँसकर बाँहें फैलाईं,
भावों से भीगे अधरों से,
जैसे पतझड़ में फूल खिले हों,
संबोधन के मधु नरों से।
हृदय का द्वार खुला सहसा ही,
खुशियों ने पहचान लिया,
जो खो गया था पथ में मेरा,
उसने फिर से नाम लिया।
आज नयन में स्वप्न संजोया,
हृदय पुलक, गात सुगंधित है,
सच, आज मैं बहुत सुखी हूँ
स्नेह-वृक्ष से फिर सिंचित है।
