सच कहूँ तुम आए, और जीवन फिर से मुस्कराने लगा। जैसे सूनी डालों पर फिर से कोई पुष्प खिल गया। वो सुख जो छूट गया था कहीं, वो हँसी जो खो गई थी राहों में, अब थामे है मेरा हाथ तुम्हारी मोहब्बत की पवित्र बाँहों में।
तुमने मेरी साँसों को अर्थ दिया, मेरे मौन को नाम दिया, प्रेम को केवल चाह नहीं, एक पूजा का स्थान दिया। अब तुमसे बढ़कर क्या चाहिए? साँसों से ज़्यादा तुम जरूरी हो, मेरे हर पल की धड़कन में तुम्हारी ही सदा पूरी हो। यूँ ही रहना… मेरे साथ, मेरे पास, मेरे बनकर… केवल मेरे बनकर। क्योंकि यह दिल जानता है उस मोहब्बत का आलम जिसे कोई अल्फ़ाज़ नहीं, सिर्फ़ एक नाम चाहिए तुम।