मदन मोहन 'मैत्रेय'
मदन मोहन “मैत्रेय” का जन्म बिहार राज्य के दरभंगा अनुमंडल अंतर्गत रतनपुर गाँव में एक साधारण परिवार में हुआ। कठिन आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद आपने शिक्षा प्राप्त की और साहित्य के प्रति आपकी ललक बाल्यकाल से ही परिलक्षित होती रही। यही ललक धीरे-धीरे आपकी पहचान बन गई और ईश्वर की कृपा से वर्ष 2022 में आपकी चार महत्वपूर्ण रचनाएँ प्रकाशित हुईं, जिनमें तीन उपन्यास और एक काव्य-संग्रह शामिल है। आपकी लेखनी समाज की ज्वलंत समस्याओं, युवाओं की मनोदशा, और सामाजिक सरोकारों को रचनात्मक ढंग से प्रस्तुत करती है।
लावण्य प्रेम (भाग-6)
रुचिता अपार्टमेंट!…
दिल्ली के बाहरी इलाके में बनी ललिता कॉलोनी के अंतिम छोर पर यह स्थित था। वैसे तो कॉलोनी के सभी अपार्टमेंट एक जैसे दिखते थे, किंतु रुचिता अपार्टमेंट को बनने के बाद थोड़ा मॉडिफाई (Modify) किया गया था, इसलिए वह कुछ अलग दिखता था।और अलग दिखे भी क्यों नहीं, जब उसका मालिक आलोक वैष्णव बेहद शौकीन मिज़ाज का था। वह एक अमीर बाप की औलाद था, इसलिए उसकी इच्छाएँ भी अनंत थीं। तभी तो वह अपने मुख्य घर को छोड़कर इस अपार्टमेंट में अकेले रहता था। ब्रांडेड कपड़े पहनना, कीमती गाड़ियों का कलेक्शन रखना और रोज़ देर रात तक किसी न किसी क्लब में रंगरलियां मनाना उसकी आदत थी।आज भी वह अपने रूटीन के मुताबिक क्लब में मस्ती करके लौटा था और अपार्टमेंट के आगे कार पार्क कर रहा था। नशे की हल्की लहर में डूबा हुआ, वह होंठों ही होंठों में कोई गीत गुनगुना रहा था। चूँकि वह यहाँ अकेला रहता था, इसलिए उसकी चाल में कोई जल्दबाज़ी नहीं दिख रही थी। उसने आराम से कार लॉक की, फिर धीरे-धीरे आगे बढ़ता हुआ दरवाज़े पर पहुँचा और मेन गेट खोल दिया।फिर दरवाज़ा खोलकर वह अपार्टमेंट के अंदर दाखिल हुआ। “उफ़!… बाहर इतनी रोशनी और अंदर घनघोर अंधेरा!” उसने खुद से कहा और दीवार टटोलकर स्विच बोर्ड के सारे स्विच ऑन कर दिए। पलक झपकते ही पूरा हॉल रोशनी से नहा गया। इसके साथ ही उसके होंठों पर एक बिंदास मुस्कान तैर गई। फिर अपने लहजे में थोड़ा सा अहंकार भरकर उसने हॉल में इधर-उधर देखा।
वहाँ पूरी तरह आधुनिक साज-सज्जा थी। विदेश से मंगवाए हुए फर्नीचर हॉल की शोभा बढ़ा रहे थे। यूँ कहा जाए कि वहाँ ऐश-ओ-आराम की तमाम इंपोर्टेड वस्तुएँ मौजूद थीं। हॉल में पसरी उस भव्यता को देखकर वह एक बार फिर मुस्कुराया और किचन की ओर बढ़ गया।किचन में पहुँचते ही उसने अपने लिए फटाफट थोड़ा नाश्ता और कॉफी बनाई। उन्हें प्लेट में सजाकर वह वापस हॉल में आ गया। सेंटर टेबल पर प्लेट रखकर वह सोफे पर पसर गया। तभी अचानक उसके मन में न्यूज़ देखने की इच्छा हुई। उसने रिमोट से टीवी ऑन किया और एक न्यूज़ चैनल लगाकर छोड़ दिया, फिर नाश्ता करने में तल्लीन हो गया।वैसे, न्यूज़ देखने में उसकी कोई विशेष दिलचस्पी नहीं थी। वह तो बस एक रूटीन की तरह जब अपार्टमेंट लौटता था, तो न्यूज़ चैनल पर एक उचटती हुई नज़र डाल लेता था। उसके मन में यह बात बैठी हुई थी कि चैनल वाले अपनी टीआरपी (TRP) बढ़ाने के लिए खबरों का भेल बना देते हैं। वे सिर्फ अपना फायदा देखते हैं और इसीलिए बिना मतलब की खबरों को भी प्रमुखता से दिखाते हैं।इतना ही नहीं, कभी-कभी तो ब्रेकिंग न्यूज़ बताकर एक ही खबर को सुबह से लेकर शाम तक इस तरह दिखाते हैं कि दर्शक के मन में उत्तेजना फैल जाए। न्यूज़ ज़्यादा न देखने का एक कारण यह भी था कि वह रंगीन मिज़ाज का था; फ़िल्में देखना और गाने सुनना ही उसे पसंद था। वह तो बस मुख्य-मुख्य खबरें जान लेना चाहता था, इसलिए स्क्रीन पर देखे बिना ही खबरें सुन रहा था और धीरे-धीरे अपना नाश्ता और कॉफी खत्म कर रहा था।
वैसे भी क्लब में उसने इतनी पी रखी थी कि पेट में भारी भोजन खाने की जगह ही नहीं बची थी। वह जो पहले सिर्फ शौकिया पीता था—आखिर बड़े बाप का बेटा जो ठहरा, ऐसे में उसके लिए थोड़ी सी शराब पी लेना कोई बड़ी बुराई नहीं थी—लेकिन इधर कुछ महीनों से उसके पीने की रफ़्तार बढ़ गई थी।वह जो पहले एक-दो पैग तक सीमित रहता था, अचानक क्लब में घंटों बैठकर पूरी की पूरी बोतल गटकने लगा था। ऐसा उसके कॉलेज की दिनचर्या में आए बदलाव के कारण हुआ था। वह जानता था कि वह सुंदर है, बात करने में स्मार्ट है और अमीर बाप की औलाद भी है, फिर भी न जाने क्यों कॉलेज में लड़के और लड़कियां उससे दूरी बनाकर रहते थे; वह भी बिना किसी ठोस कारण के।
उसकी संगत भी ऐसी नहीं थी जिससे किसी को डर लगे, किंतु फिर भी कॉलेज में उसे हमेशा इग्नोर (Ignore) किया जाता था। वह जब भी किसी लड़के या लड़की के सामने जाता, उसे कोई रिस्पांस नहीं मिलता था। यहाँ तक कि वह जब किसी के पास से गुज़रता, तो लोग उसे देखकर मुँह फेर लेते थे।वह जिस लड़की से बात करना चाहता था या करीब आना चाहता था, वह भी उससे कन्नी काटती थी। यही बात उसके मन को बहुत खलती थी। वह पिछले कुछ महीनों से अपने स्वभाव को मिलनसार बनाने का प्रयास कर रहा था, पर कोई उसके करीब आने को तैयार ही नहीं था। इस बात को लेकर वह मन ही मन गहरी वेदना महसूस करता था।इसीलिए उसने कई बार अपनी अंतरात्मा को टटोलने का प्रयास किया था। वह घंटों आईने के सामने खड़े होकर अपने अक्स को देखता रहता। यह प्रक्रिया उसने न जाने कितनी ही बार की थी और खुद को बुद्धि की कसौटी पर कसा था, किंतु वह अपने अंदर कोई कमी तलाश नहीं पाया था।
अमीर बाप का बेटा होने के कारण वह थोड़ा तुनकमिज़ाज ज़रूर था, पर ऐसा भी नहीं था कि वह लोगों का सम्मान न करता हो। वह सबका आदर करता था और अमीर-गरीब में कभी भेदभाव नहीं करता था। पूरे कॉलेज में वह सबसे सुंदर, स्मार्ट और बातूनी था, जो किसी का भी मन बहला सकता था।फिर भी न जाने क्यों कॉलेज के छात्र उससे दूरी बनाकर रखते थे। खैर, उसने सोचा कि फिलहाल उसे नाश्ता और कॉफी खत्म करनी चाहिए, फिर कुछ पल न्यूज़ देखेगा और उसके बाद संगीत सुनते हुए यहीं सो जाएगा और सपनों की दुनिया में खो जाएगा।यह सोचते ही उसने नाश्ता और कॉफी खत्म की। कप और प्लेट उठाकर वह किचन में रख आया, फिर वापस आकर सोफे पर बैठा और टीवी स्क्रीन पर अपनी नज़रें जमा दीं। लेकिन स्क्रीन देखते ही वह सोफे पर बैठा-बैठा उछल पड़ा! उसे लगा जैसे एक साथ हज़ारों बिच्छुओं ने उसे डंक मार दिया हो। वह जिसकी कल्पना भी नहीं कर सकता था, न्यूज़ में वही दिखाया जा रहा था।यही कारण था कि वह आश्चर्य के समंदर में गोते खाने लगा। कुछ पल पहले तक वह खुद के साथ हो रहे रूखे व्यवहार को लेकर जो दर्द महसूस कर रहा था, उस वेदना को वह भूल चुका था; अब उसकी जगह गहरी हैरत और उत्कंठा ने ले ली थी। उसकी आँखें टीवी स्क्रीन पर जम गईं और अचानक उसके मुँह से निकला—
“ऐसा भला कैसे हो सकता है?…”
