उठ-उठ री लघु-लघु लोल लहर जयशंकर प्रसाद उठ-उठ री लघु-लघु लोल लहर!करुणा की नव अँगराई-सी,मलयानिल की परछाईं-सी,इस सूखे तट पर छिटक छहर!शीतल कोमल चिर कंपन-सी,दुर्ललित हठीले बचपन-सी,तू लौट कहाँ जाती है री—यह खेल-खेल ले ठहर-ठहर!उठ-उठगिर-गिर-गिर फिर-फिर आती,नर्तित पद-चिह्न बना जाती,सिकता की रेखाएँ उभार—भर जाती अपनी तरल-सिहर!तू भूल न री, पंकज वन मेंजीवन के इस सूनेपन में,ओ प्यार-पुलक से भरी ढुलक!ओ चूम पुलिन के विरस अधर!