अरे कहीं देखा है तुमने जयशंकर प्रसाद अरे कहीं देखा है तुमनेमुझे प्यार करने वाले को ?मेरी आँखों में आकर फिरआँसू बन ढरने वाले को ?सूने नभ में आग जलाकरयह सुवर्ण-सा हृदय गला करजीवन संध्या को नहला कररिक्त जलधि भरने वाले को ?रजनी के लघु-लघु तम कन मेंजगती की ऊष्मा के वन मेंउस पर पड़ते तुहिन सघन मेंछिप, मुझसे डरने वाले को ?निष्ठुर खेलों पर जो अपनेरहा देखता सुख के सपनेआज लगा है क्यों वह कँपनेदेख मौन मरने वाले को ?