उस दिन
जब गांधारी ने
अपनी आँखों पर पट्टी बाँधी थी,
केवल एक स्त्री ने
अपने नेत्र नहीं ढँके थे
एक युग ने
अपनी चेतना पर
अंधकार का वस्त्र ओढ़ लिया था।
वह चाहती तो
धृतराष्ट्र की उँगली थाम
उसे प्रकाश तक ले जाती,
उसके भीतर के भय को
धीरे-धीरे
सूर्योदय में बदल देती।
पर उसने प्रेम को
त्याग की उस वेदी पर रख दिया
जहाँ स्त्रियाँ
अपने ही सत्य की बलि देती आई हैं।
मैं सोचती हूँ
क्या प्रेम इतना निर्दयी होता है
कि एक आँख रोए
तो दूसरी भी
स्वयं को फोड़ ले?
हस्तिनापुर के गलियारों में
जब दुर्योधन का अहंकार
पहली बार
अंगड़ाई लेकर उठा होगा,
तब शायद
किसी स्त्री की खुली आँखें
उसे रोक सकती थीं।
पर महलों में
करुणा तो थी,
चेतावनी नहीं।
ममता तो थी,
प्रतिरोध नहीं।
गांधारी,
तुम्हारी पट्टी
केवल कपड़े की नहीं थी
वह उन सभी स्त्रियों की चुप्पी थी
जो प्रेम के नाम पर
अपने भीतर का सूर्य बुझा देती हैं।
तुमने सोचा होगा
पति का दुःख बाँटना ही धर्म है।
पर कौन कहेगा
कि कभी-कभी
धर्म का अर्थ
अंधे के साथ अंधा हो जाना नहीं,
उसकी आँख बन जाना भी होता है।
कुरुक्षेत्र में
जब शवों के बीच
तुम्हारी चीख
आकाश पर फट रही थी,
तब शायद
तुम्हारी बंद आँखों के भीतर
एक प्रश्न जल रहा था
काश,
मैंने उस दिन
पट्टी नहीं बाँधी होती…
और तब
सारी पृथ्वी पर
एक स्त्री की करुणा
राख बनकर उड़ती रही
जैसे संध्या
अपने ही आँचल में
डूबते सूर्य का रक्त छिपा रही हो।
