तनाव

जिसे मैं तनाव समझ रही थी
वह सहजता का खो जाना था
मैं घुटन महसूस कर रही थी
और मैंने स्वयं को एक अंतहीन संघर्ष में फंसा हुआ पाया।
“हेल्प मी”- भारी शब्द थे
मैंने कभी नहीं कहें
मेरी मौन चीखें ब्रह्माण्ड की तरंगों में जा मिली थी
मुझे अग्नि की लपटें दिखाई दे रही थी
जैसे मैं स्वयं को स्वाह कर रही हूँ
कंकाल हो जाना , कला नहीं है
यह मृत्यु का आह्वान है
मानसिक दुर्दशा है
मृत्यु समान पीड़ा है।