हम

हम दोनों के
हम होने की प्रक्रिया में
मुझे तुम होना था,
और तुम्हें मैं।

मैं धीरे-धीरे तुम होती गई—
अपनी इच्छाएँ,
अपने शब्द,
अपने रंग तुम्हारे नाम करती गई।
पर तुम मेरी ओर उतनी दूर कभी नहीं आए।
तुम तुम ही बने रहे।
और इस तरह
हमारा हम बराबरी से नहीं बना,
वह केवल तुम्हारा विस्तार बन गया।
उसमें तुम थे,
तुम्हारे सपने,
तुम्हारी इच्छाएँ,
तुम्हारी दुनिया।
मैं थी भी,
तो बस उतनी जितनी तुम्हें चाहिए थी।
और अंततः
जिसे हम कहते रहे,
वह हम नहीं था—
वह सिर्फ़ तुम थे,
जिसमें मैं कहीं नहीं थी।