सिनेमा हॉल में
एक साथ बैठे थे हम दोनों।
एक ही पर्दे पर
एक ही फ़िल्म चल रही थी।
तुमने देखा प्रेम,
मैंने देखा समर्पण।
तुमने देखा त्याग,
मैंने देखा स्त्री से की गई अपेक्षा।
तुम्हें नायक संघर्ष करता दिखा,
मुझे नायिका चुप कराई जाती दिखी।
तुम्हें कहानी में रोमांस दिखा,
मुझे उसमें सदियों से दोहराया जाता एक पुराना अनुबंध।
फ़िल्म एक ही थी,
पर हमारी आँखें एक जैसी नहीं थीं।
तुम उस दुनिया से आए थे
जहाँ तुम्हें स्वयं को
मनुष्य मान लेने की सुविधा थी।
मैं उस दुनिया से आई थी
जहाँ मुझे हर दिन
पहले स्त्री सिद्ध करना पड़ता था,
फिर मनुष्य।
इसलिए
पर्दे पर जो दिखाई दे रहा था,
मैं केवल वही नहीं देख रही थी—
मैं वह भी देख रही थी
जो अनुपस्थित था,
जिसे लिखा नहीं गया,
जिसे बोलने नहीं दिया गया।
और शायद यही कारण है
कि एक ही फ़िल्म
हम दोनों के लिए
एक जैसी नहीं हो सकी।
क्या तुम कभी
इसके बारे में सोच पाओगे—
कि स्त्रियाँ केवल फ़िल्में नहीं,
इस पूरी दुनिया को भी
तुमसे अलग देखकर जीती हैं?
